भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1778

तमपि सरथवाजिसारथिं शिनिवृषभो विविधैः शरैस्त्वरन् । भुजगविषसमप्रभै रणे पुरुषवरं समवास्तृणोत् तदा ॥ १० ॥ तब शिनिवंशशिरोमणि सात्यकिने बड़ी उतावलीके साथ विषधर सर्पोंके समान विषैले नाना प्रकारके बाणोंद्वारा रथ, घोड़े और सारथिसहित नरश्रेष्ठ कर्णको भी आच्छादित कर दिया ॥ १० ॥

शिनिवृषभशरैर्निपीडितं तव सुहृदो वसुषेणमभ्ययुः । त्वरितमतिरथा रथर्षभं द्विरदरथाश्वपदातिभिः सह ॥ ११ ॥ उस समय आपके हितैषी सुहृद् अतिरथी वीर वहाँ शिनिवंशशिरोमणि सात्यकिके शरोंसे अत्यन्त पीड़ित हुए महारथी कर्णके पास हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी चतुरंगिणी सेना साथ लेकर तुरंत आ पहुँचे ॥ ११ ॥

तदुदधिनिभमाद्रवद् बलं त्वरिततरैः समभिद्रुतं परैः । द्रुपदसुतमुखैस्तदाभवत् पुरुषरथाश्वगजक्षयो महान् ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् धृष्टद्युम्न आदि शीघ्रकारी शत्रुओंने आपकी समुद्र-सदृश विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया और आपकी सेना भी शत्रुओंकी ओर दौड़ी। फिर तो वहाँ मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियोंका महान् संहार होने लगा ॥ १२ ॥

अथ पुरुषवरौ कृताह्निकौ भवमभिपूज्य यथाविधि प्रभुम् । अरिवधकृतनिश्चयौ द्रुतं तव बलमर्जुनकेशवौ सृतौ ॥ १३ ॥ तदनन्तर अपराह्नकालके कृत्य समाप्त करके विधिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करनेके पश्चात् नरश्रेष्ठ अर्जुन और श्रीकृष्ण शत्रुओंके वधका निश्चय करके तुरंत आपकी सेनापर चढ़ आये ॥ १३ ॥

जलदनिनदनिःस्वनं रथं पवनविधूतपताककेतनम् । सितहयमुपयान्तमन्तिकं हृतमनसो ददृशुस्तदारयः ॥ १४ ॥