महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1782, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहन्यमानाः शरैरार्तास्तदा भीताः प्रदुद्रुवुः ॥ ३६ ॥
उस समय घोड़े, हाथी और मनुष्योंको ऐसा युद्ध प्राप्त हुआ, जिसमें मृत्यु निश्चित है। उन सब लोगोंपर जब बाणोंकी मार पड़ने लगी, तब वे सब-के-सब आर्त और भयभीत होकर भाग चले ॥ ३६ ॥
त्वदीयानां तदा युद्धे संसक्तानां जयैषिणाम् ।
गिरिमस्तं समासाद्य प्रत्यपद्यत भानुमान् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार जब आपके विजयाभिलाषी सैनिक युद्धमें संलग्न हो रहे थे, उसी समय सूर्यदेव अस्ताचल पहुँचकर डूब गये ॥ ३७ ॥
तमसा च महाराज रजसा च विशेषतः ।
न किंचित् प्रत्यपश्याम शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ ३८ ॥
महाराज! उस समय अन्धकार और विशेषतः धूलसे सब कुछ आच्छादित होनेके कारण हमलोग किसी भी शुभ या अशुभ वस्तुको देख नहीं पाते थे ॥ ३८ ॥
ते त्रसन्तो महेष्वासा रात्रियुद्धस्य भारत ।
अपयानं ततश्चक्रुः सहिताः सर्वयोधिभिः ॥ ३९ ॥
भारत! वे महाधनुर्धर योद्धा रात्रियुद्धसे डरते थे। इसलिये समस्त सैनिकोंके साथ उन्होंने वहाँसे शिविरको प्रस्थान कर दिया ॥ ३९ ॥
कौरवेष्वपयातेषु तदा राजन् दिनक्षये ।
जयं सुमनसः प्राप्य पार्थाः स्वशिविरं ययुः ॥ ४० ॥
वादित्रशब्दैर्विविधैः सिंहनादैः सगर्जितैः ।
परानुपहसन्तश्च स्तुवन्तश्चाच्युतार्जुनौ ॥ ४१ ॥
राजन्! दिनके अन्तमें कौरवोंके हट जानेपर पाण्डव भी विजय पाकर प्रसन्नचित्त हो भाँति-भाँतिके बाजोंकी आवाज, सिंहनाद और गर्जनाके द्वारा शत्रुओंका उपहास और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी स्तुति करते हुए अपने शिविरको लौट गये ॥ ४०-४१ ॥
कृतेऽवहारे तैर्वीरैः सैनिकाः सर्व एव ते ।
आशीर्वाचः पाण्डवेषु प्रायुञ्जन् नरेश्वराः ॥ ४२ ॥
उन वीरोंके द्वारा युद्धका उपसंहार कर दिये जानेपर समस्त सैनिक और नरेश पाण्डवोंको आशीर्वाद देने लगे ॥ ४२ ॥
ततः कृतेऽवहारे च प्रहृष्टास्तत्र पाण्डवाः ।
निशायां शिविरं गत्वा न्यवसन्त नरेश्वराः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार सैनिकोंके लौटा लिये जानेपर हर्षमें भरे हुए पाण्डव-पक्षीय नरेश रातको शिविरमें जाकर सो रहे ॥ ४३ ॥
ततो रक्षः पिशाचाश्च श्वापदाश्चैव संघशः ।
जग्मुरायोधनं घोरं रुद्रस्याक्रीडसंनिभम् ॥ ४४ ॥