महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1845, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत्तु कर्णमहं ब्रूयां हितकामः प्रियाप्रिये । मम तत् क्षमतां सर्वं भवान् कर्णश्च सर्वशः ॥ ४३ ॥ परंतु मैं हितकी इच्छा रखते हुए कर्णसे जो भी प्रिय अथवा अप्रिय वचन कहूँ, वह सब तुम और कर्ण सर्वथा क्षमा करो ॥ ४३ ॥
कर्ण उवाच
ईशानस्य यथा ब्रह्मा यथा पार्थस्य केशवः । तथा नित्यं हिते युक्तो मद्रराज भवस्व नः ॥ ४४ ॥ कर्णने कहा— मद्रराज! जैसे ब्रह्मा महादेवजीके और श्रीकृष्ण अर्जुनके हितमें सदा तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार आप भी निरन्तर हमारे हितसाधनमें संलग्न रहें ॥
शल्य उवाच
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः । अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ॥ ४५ ॥ शल्य बोले— अपनी निन्दा और प्रशंसा, परायी निन्दा और परायी स्तुति—ये चार प्रकारके बर्ताव श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ॥ ४५ ॥ यत् तु विद्वन् प्रवक्ष्यामि प्रत्ययार्थमहं तव । आत्मनः स्तवसंयुक्तं तन्निबोध यथातथम् ॥ ४६ ॥ परंतु विद्वन्! मैं तुम्हें विश्वास दिलानेके लिये जो अपनी प्रशंसासे भरी बात कहता हूँ, उसे तु यथार्थरूपसे सुनो ॥ ४६ ॥ अहं शक्रस्य सारथ्ये योग्यो मातलिवत् प्रभो । अप्रमादात् प्रयोगाच्च ज्ञानविद्याचिकित्सनैः ॥ ४७ ॥ प्रभो! मैं सावधानी, अश्वसंचालन, ज्ञान, विद्या तथा चिकित्सा आदि सद्गुणोंकी दृष्टिसे इन्द्रके सारथि-कर्ममें नियुक्त मातलिके समान सुयोग्य हूँ ॥ ४७ ॥ ततः पार्थेन संग्रामे युध्यमानस्य तेऽनघ । वाहयिष्यामि तुरगान् विज्वरो भव सूतज ॥ ४८ ॥ निष्पाप सूतपुत्र कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें अर्जुनके साथ युद्ध करोगे, तब मैं तुम्हारे घोड़े अवश्य हाँकूँगा। तुम निश्चिन्त रहो ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्यस्वीकारे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यके सारथिकर्मको स्वीकार करनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥