भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1852

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन

संजय उवाच

दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं युयुत्सुं समवस्थितम् ।
चुक्रुशुः कुरवः सर्वे हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब महाधनुर्धर कर्ण युद्धकी इच्छासे समरांगणमें डटकर खड़ा हो गया, तब समस्त कौरव बड़े हर्षमें भरकर सब ओर कोलाहल करने लगे ॥

ततो दुन्दुभिनिर्घोषैर्भेरीणां निनदेन च ।
बाणशब्दैश्च विविधैर्गर्जितैश्च तरस्विनाम् ॥ २ ॥
निर्ययुस्तावका युद्धे मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
तदनन्तर आपके पक्षके समस्त वीर दुन्दुभि और भेरियोंकी ध्वनि, बाणोंकी सनसनाहट और वेगशाली वीरोंकी विविध गर्जनाओंके साथ युद्धके लिये निकल पड़े। उनके मनमें यह निश्चय था कि अब मौत ही हमें युद्धसे निवृत्त कर सकेगी ॥ २ १/२ ॥

प्रयाते तु ततः कर्णे योधेषु मुदितेषु च ॥ ३ ॥
चचाल पृथिवी राजन् ववाश च सुविस्तरम् ।
राजन्! कर्ण और कौरव योद्धाओंके प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान करनेपर धरती डोलने और बड़े जोर-जोरसे अव्यक्त शब्द करने लगी ॥ ३ १/२ ॥

निःसरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात् सप्त महाग्रहाः ॥ ४ ॥
उल्कापाताश्च संजज्ञुर्दिशां दाहास्तथैव च ।
शुष्काशन्यश्च सम्पेतुर्युवार्ताश्च भैरवाः ॥ ५ ॥
उस समय सूर्यमण्डलसे सात बड़े-बड़े ग्रह निकलते दिखायी दिये, उल्कापात होने लगे, दिशाओंमें आग-सी जल उठी, बिना वर्षाके ही बिजलियाँ गिरने लगीं और भयानक आँधी चलने लगी ॥ ४-५ ॥

मृगपक्षिगणाश्चैव पृतनां बहुशस्तव ।
अपसव्यं तदा चक्रुर्वेदयन्तो महाभयम् ॥ ६ ॥
बहुतेरे मृग और पक्षी महान् भयकी सूचना देते हुए अनेक बार आपकी सेनाको दाहिने करके चले गये ॥ ६ ॥

प्रस्थितस्य च कर्णस्य निपेतुस्तुरगा भुवि ।
अस्थिवर्षं च पतितमन्तरिक्षाद् भयानकम् ॥ ७ ॥