महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1858, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाथ ही उन्हें जीत लूँगा' ।। ३१ ।।
संजय उवाच
इति रणरभसस्य कत्थत- स्तदुत निशम्य वचः स मद्रराट् । अवहसदवमन्य वीर्यवान् प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम् ।। ३२ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! पराक्रमी मद्रराज शल्य युद्धके उत्साहमें भरकर बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाले कर्णके उस कथनको सुनकर उसकी अवहेलना करके उपहास करने लगे। उन्होंने फिर ऐसी बातें कहनेसे कर्णको रोका और इस प्रकार उत्तर दिया ।। ३२ ।।
शल्य उवाच
विरम विरम कर्ण कत्थना- दतिरभसोऽप्यतिवाचमुक्तवान् । क्व च हि नरवरो धनंजयः क्व पुनरहो पुरुषाधमो भवान् ।। ३३ ।।
**शल्यने कहा—**कर्ण! बस, अब बढ़-बढ़कर बातें बनाना बंद करो, बंद करो। तुम अधिक जोशमें आकर अपनी शक्तिसे बहुत बड़ी बात कह गये। भला, कहाँ नरश्रेष्ठ अर्जुन और कहाँ मनुष्योंमें अधम तुम? ।। ३३ ।।