भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1861

यदि न रिपुभयात् पलायसे समरगतोऽद्य हतोऽसि सूतज ॥ ४० ॥ सूतपुत्र! अब आज तुम्हारे वधके लिये पुनः यह दूसरा उत्तम युद्ध उपस्थित हुआ है। यदि तुम शत्रुके भयसे भाग नहीं गये तो समरांगणमें पहुँचकर अवश्य मारे जाओगे ॥ ४० ॥

संजय उवाच

इति बहु परुषं प्रभाषति प्रमनसि मद्रपतौ रिपुस्तवम् । भृशमभिरुषितः परंतपः कुरुपृतनापतिराह मद्रपम् ॥ ४१ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! जब महामना मद्रराज शल्य इस प्रकार शत्रु की प्रशंसासे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत-सी कड़वी बातें सुनाने लगे, तब कौरव-सेनापति शत्रुसंतापी कर्ण अत्यन्त क्रोधसे जल उठा और शल्यसे बोला ॥ ४१ ॥

कर्ण उवाच

भवतु भवतु किं विकत्थसे ननु मम तस्य हि युद्धमुद्यतम् । यदि स जयति मामिहाहवे तत इदमस्तु सुकत्थितं तव ॥ ४२ ॥ **कर्णने कहा—**रहने दो, रहने दो। क्यों बहुत बड़बड़ा रहे हो। अब तो मेरा और उनका युद्ध उपस्थित हो ही गया है। यदि अर्जुन यहाँ युद्धमें मुझे परास्त कर दें, तब तुम्हारा यह बढ़-बढ़कर बातें करना ठीक और अच्छा समझा जायगा ॥ ४२ ॥

संजय उवाच

एवमस्त्विति मद्रेश उक्त्वा नोत्तरमुक्तवान् । याहि शल्येति चाप्येनं कर्णः प्राह युयुत्सया ॥ ४३ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! तब मद्रराज शल्य 'एवमस्तु' कहकर चुप हो गये। उन्होंने कर्णकी उस बातका कोई उत्तर नहीं दिया। तब कर्णने युद्धकी इच्छासे उनसे कहा—'शल्य! रथ आगे ले चलो' ॥ ४३ ॥

स रथः प्रययौ शत्रून् श्वेताश्वः शल्यसारथिः । निघ्नन्नमित्रान् समरे तमो घ्नन् सविता यथा ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् शल्य जिसके सारथि थे और जिसमें श्वेत घोड़े जुते हुए थे, वह विशाल रथ अन्धकारका विनाश करनेवाले सूर्यदेवके समान शत्रुओंका संहार करता हुआ आगे