भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1902

ब्रूयां हृष्टः समितौ क्षत्रियाणाम् ॥ २७ ॥ किं त्वं मूर्खः प्रसभं मूढचेता ममावोचः पौरुषं फाल्गुनस्य । ‘मैं इस युद्धस्थलमें क्षत्रियोंके समाजमें बड़े हर्ष और उल्लासके साथ पाण्डुपुत्र अर्जुनके उत्साहका वर्णन कर सकता हूँ। तुम्हारे मनमें तो मूढ़ता भरी हुई है। तुम मूर्ख हो। फिर तुमने मुझसे अर्जुनके पुरुषार्थका हठपूर्वक वर्णन क्यों किया? ।। २७ १/२ ।। अप्रियो यः पुरुषो निष्ठुरो हि क्षुद्रः क्षेप्ता क्षमिणश्चाक्षमावान् ॥ २८ ॥ हन्यामहं तादृशानां शतानि क्षमाम्यहं क्षमया कालयोगात् । ‘जो अप्रिय, निष्ठुर, क्षुद्र हृदय और क्षमाशून्य मनुष्य क्षमाशील पुरुषोंकी निन्दा करता है; ऐसे सौ-सौ मनुष्योंका मैं वध कर सकता हूँ; परंतु कालयोगसे क्षमाभावद्वारा मैं यह सब कुछ सह लेता हूँ ।। २८ १/२ ।। अवोचस्त्वं पाण्डवार्थेऽप्रियाणि प्रधर्षयन् मां मूढवत् पापकर्मन् ॥ २९ ॥ मय्यार्जवे जिह्ममतिर्हतस्त्वं मित्रद्रोही साप्तपदं हि मैत्रम् । ‘ओ पापी! मूर्खके समान तुमने पाण्डुपुत्र अर्जुनके लिये मेरा तिरस्कार करते हुए मेरे प्रति अप्रिय वचन सुनाये हैं। मेरे प्रति सरलताका व्यवहार करना तुम्हारे लिये उचित था; परंतु तुम्हारी बुद्धिमें कुटिलता भरी हुई है, अतः तुम मित्रद्रोही होनेके कारण अपने पापसे ही मारे गये। किसीके साथ सात पग चल देने मात्रसे ही मैत्री सम्पन्न हो जाती है (किंतु तुम्हारे मनमें उस मैत्रीका उदय नहीं हुआ) ।। २९ १/२ ।। कालस्त्वयं प्रत्युपयाति दारुणो दुर्योधनो युद्धमुपागमद् यत् ॥ ३० ॥ अस्यार्थसिद्धिं त्वभिकाङ्क्षमाण- स्तन्मन्यसे यत्र नैकान्त्यमस्ति । ‘यह बड़ा भयंकर समय सामने आ रहा है। राजा दुर्योधन रणभूमिमें आ पहुँचा है। मैं उसके मनोरथकी सिद्धि चाहता हूँ; किंतु तुम्हारा मन उधर लगा हुआ है, जिससे उसके कार्यकी सिद्धि होनेकी कोई सम्भावना नहीं है ।। ३० १/२ ।। मित्रं मिन्देर्नन्दतेः प्रीयतेर्वा संत्रायतेर्मिनुतेर्मोदतेर्वा ॥ ३१ ॥ ब्रवीमि ते सर्वमिदं ममास्ति तच्चापि सर्वं मम वेत्ति राजा ।