भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1904, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1904

सगदाद् वा धनपतेः सवज्राद् वापि वासवात् ॥ ३६ ॥ अन्यस्मादपि कस्माच्चिदमित्रादाततायिनः । इति शल्य विजानीहि यथा नाहं बिभेम्यतः ॥ तस्मान्न मे भयं पार्थान्नापि चैव जनार्दनात् ॥ ३७ ॥ सह युद्धं हि मे ताभ्यां साम्पराये भविष्यति । ‘शल्य! मैं दण्डधारी सूर्यपुत्र यमराजसे, पाशधारी वरुणसे, गदा हाथमें लिये हुए कुबेरसे, वज्रधारी इन्द्रसे अथवा दूसरे किसी आततायी शत्रुसे भी कभी नहीं डरता। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। इसीलिये मुझे अर्जुन और श्रीकृष्णसे भी कोई भय नहीं है। उन दोनोंके साथ रणक्षेत्रमें मेरा युद्ध अवश्य होगा ॥ ३६-३७ १/२ ॥

कदाचित् विजयस्याहमस्त्रहेतोरटन्नृप ॥ ३८ ॥ अज्ञानाद्धि क्षिपन् बाणान् घोररूपान् भयानकान् । होमधेन्वा वत्समस्य प्रमत्त इषुणाहनम् ॥ ३९ ॥ ‘नरेश्वर! एक समयकी बात है, मैं शस्त्रोंके अभ्यासके लिये विजय नामक एक ब्राह्मणके आश्रमके आसपास विचरण कर रहा था। उस समय घोर एवं भयंकर बाण चलाते हुए मैंने अनजानमें ही असावधानीके कारण उस ब्राह्मणकी होमधेनुके बछड़ेको एक बाणसे मार डाला ॥ ३८-३९ ॥

चरन्तं विजने शल्य ततोऽनुव्याजहार माम् । यस्मात् त्वया प्रमत्तेन होमधेन्वा हतः सुतः ॥ ४० ॥ श्वभ्रे ते पततां चक्रमिति मां ब्राह्मणोऽब्रवीत् । युध्यमानस्य संग्रामे प्राप्तस्यैकायनं भयम् ॥ ४१ ॥ ‘शल्य! तब उस ब्राह्मणने एकान्तमें घूमते हुए मुझसे आकर कहा—‘तुमने प्रमादवश मेरी होमधेनुके बछड़ेको मार डाला है। इसलिये तुम जिस समय रणक्षेत्रमें युद्ध करते-करते अत्यन्त भयको प्राप्त होओ उसी समय तुम्हारे रथका पहिया गड्ढेमें गिर जाय’ ॥

तस्माद् बिभेमि बलवद् ब्राह्मणव्याहृतादहम् । एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ ४२ ॥