महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1906, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋद्धं गृहं सर्वकामैर्यच्च मे वसु किंचन ।
तत् सर्वमस्मै सत्कृत्य प्रयच्छामि न चेच्छति ॥ ४६ ॥
'मैं सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न समृद्धिशाली घर और जो कुछ भी धन मेरे पास था, वह सब उस ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक देने लगा; परंतु उसने कुछ भी लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४६ ॥
ततोऽब्रवीनमां याचन्तमपराधं प्रयत्नतः ।
व्याहृतं यन्मया सूत तत् तथा न तदन्यथा ॥ ४७ ॥
'उस समय मैं प्रयत्नपूर्वक अपने अपराधके लिये क्षमायाचना करने लगा। तब ब्राह्मणने कहा—'सूत! मैंने जो कह दिया, वह वैसा ही होकर रहेगा। वह पलट नहीं सकता ॥ ४७ ॥
अनृतोक्तं प्रजां हन्यात् ततः पापमवाप्नुयाम् ।
तस्माद् धर्माभिरक्षार्थं नानृतं वक्तुमुत्सहे ॥ ४८ ॥
'असत्य भाषण प्रजाका नाश कर देता है, अतः मैं झूठ बोलनेसे पापका भागी होऊँगा; इसीलिये धर्मकी रक्षाके उद्देश्यसे मैं मिथ्या भाषण नहीं कर सकता ॥ ४८ ॥
मा त्वं ब्रह्मगतिं हिंस्याः प्रायश्चित्तं कृतं त्वया ।
मद्वाक्यं नानृतं लोके कश्चित् कुर्यात् समाप्नुहि ॥ ४९ ॥
'तुम (लोभ देकर) ब्राह्मणकी उत्तम गतिका विनाश न करो। तुमने पश्चात्ताप और दानद्वारा उस वत्सवधका प्रायश्चित्त कर लिया। जगत्में कोई भी मेरे कहे हुए वचनको मिथ्या नहीं कर सकता; इसलिये मेरा शाप तुझे प्राप्त होगा ही' ॥ ४९ ॥
इत्येतत्ते मया प्रोक्तं क्षिप्तेनापि सुहृत्तया ।
जानामि त्वां विक्षिपन्तं जोषमास्स्वोत्तरं शृणु ॥ ५० ॥
'मद्रराज! यद्यपि तुमने मुझपर आक्षेप किये हैं, तथापि सुहृद् होनेके नाते मैंने तुमसे ये सारी बातें कह दी हैं। मैं जानता हूँ, तुम अब भी निन्दा करनेसे बाज न आओगे, तो भी कहता हूँ कि चुप होकर बैठो और अबसे जो कुछ कहूँ, उसे सुनो' ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
१-मिद् आदि धातुओंका अर्थ क्रमशः स्नेह, आनन्द, प्रीणन (तृप्त करना), प्राण (रक्षा), सस्नेह दर्शन और आमोद है।
२-शद् आदि धातुओंका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है—शातन (काटना या छेदना), शासन करना, तनूकरण (क्षीण कर देना), हिंसा करना, अवसादन (शिथिल करना) और निष्षूदन (वध)।