महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1913, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'जो शाकलनिवासी आबालवृद्ध नर-नारी मदिरासे उन्मत्त हो चिल्ला-चिल्लाकर ऐसी गाथाएँ गाया करते हैं, उनमें धर्म कैसे रह सकता है?' ।। २९½ ।।
इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।। ३० ।।
यदन्योऽप्युक्तवानस्मान् ब्राह्मणः कुरुसंसदि ।
शल्य! इस बातको अच्छी तरह समझ लो। हर्षका विषय है कि इसके सम्बन्धमें मैं तुम्हें कुछ और बातें बता रहा हूँ, जिन्हें दूसरे ब्राह्मणने कौरव-सभामें हमलोगोंसे कहा था — ।। ३०½ ।।
पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र पीलुवनान्युत ।। ३१ ।।
शतद्रुश्च विपाशा च तृतीयैरावती तथा ।
चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुषष्ठा बहिर्गिरेः ।। ३२ ।।
आरट्टा नाम ते देशा नष्टधर्मा न तान् व्रजेत् ।
'जहाँ शतद्रु (सतलज), विपाशा (व्यास), तीसरी इरावती (रावी), चन्द्रभागा (चिनाव) और वितस्ता (झेलम)—ये पाँच नदियाँ छठी सिंधु नदीके साथ बहती हैं, जहाँ पीलु नामक वृक्षोंके कई जंगल हैं, वे हिमालयकी सीमासे बाहरके प्रदेश 'आरट्ट' नामसे विख्यात हैं। वहाँका धर्म-कर्म नष्ट हो गया है। उन देशोंमें कभी न जाय ।।
व्रात्यानां दासमीयानां वाहीकानामयज्वनाम् ।। ३३ ।।
न देवाः प्रतिगृह्णन्ति पितरो ब्राह्मणास्तथा ।
तेषां प्रनष्टधर्माणां वाहीकानामिति श्रुतिः ।। ३४ ।।
'जिनके धर्म-कर्म नष्ट हो गये हैं, वे संस्कारहीन, जारज बाहीक यज्ञ-कर्मसे रहित होते हैं। उनके दिये हुए द्रव्यको देवता, पितर और ब्राह्मण भी नहीं ग्रहण करते हैं, यह बात सुननेमें आयी है' ।। ३३-३४ ।।
ब्राह्मणेन तथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि ।
काष्ठकुण्डेषु वाहीका मृन्मयेषु च भुञ्जते ।। ३५ ।।
सक्तुमद्यावलिप्तेषु श्वावलीढेषु निर्घृणाः ।
आविकं चौष्ट्रिकं चैव क्षीरं गार्दभमेव च ।। ३६ ।।
तद्विकारांश्च वाहीकाः खादन्ति च पिबन्ति च ।
किसी विद्वान् ब्राह्मणने साधु पुरुषोंकी सभामें यह भी कहा था कि 'बाहीक देशके लोग काठके कुण्डों तथा मिट्टीके बर्तनोंमें जहाँ सत्तू और मदिरा लिपटे होते हैं और जिन्हें कुत्ते चाटते रहते हैं, घृणाशून्य होकर भोजन करते हैं। बाहीक देशके निवासी भेड़, ऊँटनी और गदहीके दूध पीते और उसी दूधके बने हुए दही-घी आदि भी खाते हैं ।। ३५-३६½ ।।
पुत्रसंकरिणो जाल्माः सर्वान्नक्षीरभोजनाः ।। ३७ ।।
आरट्टा नाम वाहीका वर्जनीया विपश्चिता ।