भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

वे खड्ग, धनुष, शक्ति, घोड़े, हाथी, मनुष्य एवं रथोंद्वारा और लोहेके डंडेसे समूह-के-समूह सैनिकोंका संहार कर डालेंगे ॥ २२ ॥ तमेनमनुवर्तन्ते सात्यकिप्रमुखा रथाः । पञ्चालाः केकया मत्स्याः पाण्डवाश्च विशेषतः ॥ २३ ॥ देखो, भीमसेनके पीछे सात्यकि आदि महारथी तथा पांचाल, केकय, मत्स्य और विशेषतः पाण्डव योद्धा भी आ रहे हैं ॥ २३ ॥ शूराश्च बलवन्तश्च विक्रान्ताश्च महारथाः । विनिघ्नन्तश्च भीमेन संरब्धेनाभिचोदिताः ॥ २४ ॥ क्रोधमें भरे हुए भीमसेनसे प्रेरित हो वे शूरवीर, बलवान् पराक्रमी महारथी सैनिक हमारे सैनिकोंको मारते आ रहे हैं ॥ २४ ॥ ते द्रोणमभिवर्तन्ते सर्वतः कुरुपुङ्गवाः । वृकोदरं परीप्सन्तः सूर्यमभ्रगणा इव ॥ २५ ॥ वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डव भीमसेनकी रक्षाके लिये द्रोणाचार्यको सब ओरसे उसी प्रकार घेर रहे हैं, जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं ॥ २५ ॥ (समरेषु तु निर्दिष्टाः पाण्डवाः कृष्णबान्धवाः । ह्रीमन्तः शत्रुमरणे निपुणाः पुण्यलक्षणाः ॥ बहवः पार्थिवा राजंस्तेषां वशगता रणे । मावमंस्थाः पाण्डवांस्त्वं नारायणपुरोगमान् ॥) राजन्! पाण्डवोंके सहायक बन्धु श्रीकृष्ण हैं। वे उन्हें युद्धविषयक कर्तव्यका निर्देश किया करते हैं। वे लज्जाशील, शत्रुओंको मारनेकी कलामें निपुण तथा पवित्र लक्षणोंसे युक्त हैं। रणभूमिमें बहुत-से भूपाल उनके वशमें आ चुके हैं। अतः भगवान् नारायण जिनके अगुआ हैं, उन पाण्डवोंकी तुम अवहेलना न करो। एकायनगता ह्येते पीडयेयुर्धृतव्रतम् । अरक्ष्यमाणं शलभा यथा दीपं मुमूर्षवः ॥ २६ ॥ ये सब एक रास्तेपर चल रहे हैं। यदि व्रत और नियमका पालन करनेवाले द्रोणाचार्यकी रक्षा न की गयी तो ये उन्हें उसी प्रकार पीड़ा देंगे, जैसे मरनेकी इच्छावाले पतंग दीपकको बुझा देनेकी चेष्टा करते हैं ॥ २६ ॥ असंशयं कृतास्त्राश्च पर्याप्ताश्चापि वारणे । अतिभारमहं मन्ये भारद्वाजे समाहितम् ॥ २७ ॥ इसमें संदेह नहीं कि वे पाण्डव योद्धा अस्त्र-विद्यामें निपुण तथा द्रोणाचार्यकी गतिको रोकनेमें समर्थ हैं। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि इस समय भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यपर बहुत बड़ा भार आ पहुँचा है ॥ २७ ॥ शीघ्रमनुगमिष्यामो यत्र द्रोणो व्यवस्थितः ।