महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः
पाण्डव-सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वेषामेव मे ब्रूहि रथचिह्नानि संजय ।
ये द्रोणमभ्यवर्तन्त क्रुद्धा भीमपुरोगमाः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! क्रोधमें भरे हुए भीमसेन आदि जो योद्धा द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर रहे थे, उन सबके रथोंके (घोड़े-ध्वजा आदि) चिह्न कैसे थे? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
ऋक्षवर्णैर्हयैर्दृष्ट्वा व्यायच्छन्तं वृकोदरम् ।
रजताश्वस्ततः शूरः शैनेयः संन्यवर्तत ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! रीछके समान रंगवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर भीमसेनको आते देख चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंवाले शूरवीर सात्यकि भी लौट पड़े ॥ २ ॥
सारङ्गाश्वो युधामन्युः स्वयं प्रत्वरयन् हयान् ।
पर्यवर्तत दुर्धर्षः क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥ ३ ॥
सारंगके³ समान (सफेद, नीले और लाल) रंगके घोड़ोंसे युक्त युधामन्यु, स्वयं ही अपने घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ द्रोणाचार्यके रथकी ओर लौट पड़ा। वह दुर्जय वीर क्रोधमें भरा हुआ था ॥ ३ ॥
पारावतसवर्णैस्तु हेमभाण्डैर्महाजवैः ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नो न्यवर्तत ॥ ४ ॥
पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न कबूतरके³ समान (सफेद और नीले) रंगवाले सुवर्णभूषित एवं अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा लौट आया ॥ ४ ॥
पितरं तु परिप्रेप्सुः क्षत्रधर्मा यतव्रतः ।
सिद्धिं चास्य परां काङ्क्षन् शोणाश्वः संन्यवर्तत ॥ ५ ॥
नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाला क्षत्रधर्मा अपने पिता धृष्टद्युम्नकी रक्षा और उनके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि चाहता हुआ लाल रंगके घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ हो लौट आया ॥ ५ ॥
पद्मपत्रनिभांश्चाश्वान् मल्लिकाक्षान् स्वलंकृतान् ।