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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1950

अथान्यं रथमास्थाय वृषसेनो महारथः ॥ ४६ ॥

द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानं च पञ्चभिः ।

भीमसेनं चतुःषष्ट्या सहदेवं च पञ्चभिः ॥ ४७ ॥

नकुलं त्रिंशता बाणैः शतानीकं च सप्तभिः ।

शिखण्डिनं च दशभिर्धर्मराजं शतेन च ॥ ४८ ॥

एतांश्चान्यांश्च राजेन्द्र प्रवीराञ्जयगृद्धिनः ।

अभ्यर्दयन्महेष्वासः कर्णपुत्रो विशाम्पते ॥ ४९ ॥

कर्णस्य युधि दुर्धर्षस्ततः पृष्ठमपालयत् ।

तदनन्तर महारथी वृषसेनने दूसरे रथपर बैठकर तिहत्तर बाणोंसे द्रौपदीके पुत्रोंको,

पाँचसे युयुधानको, चौंसठसे भीमसेनको, पाँचसे सहदेवको, तीन बाणोंसे नकुलको, सातसे

शतानीकको, दस बाणोंसे शिखण्डीको और सौ बाणोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको घायल कर

दिया। राजेन्द्र! प्रजानाथ! महाधनुर्धर कर्णपुत्रने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन सभी

प्रमुख वीरोंको तथा दूसरोंको भी अपने बाणोंसे पीड़ित कर दिया। तत्पश्चात् वह दुर्धर्ष वीर

युद्धस्थलमें पुनः कर्णके पृष्ठभागकी रक्षा करने लगा ॥ ४६-४९ १/२ ॥

दुःशासनं च शैनेयो नवैर्नवभिरायसैः ॥ ५० ॥

विसूताश्वरथं कृत्वा ललाटे त्रिभिरार्पयत् ।

सात्यकिने लोहेके बने हुए नौ नूतन बाणोंसे दुःशासनको सारथि, घोड़ों और रथसे

वंचित करके उसके ललाटमें तीन बाण मारे ॥ ५० १/२ ॥

स त्वन्यं रथमास्थाय विधिवत् कल्पितं पुनः ॥ ५१ ॥

युयुधे पाण्डुभिः सार्धं कर्णस्याप्याययन् बलम् ।

दुःशासन विधिपूर्वक सजाये हुए दूसरे रथपर बैठकर कर्णके बलको बढ़ाता हुआ पुनः

पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५१ १/२ ॥

धृष्टद्युम्नस्ततः कर्णमविध्यद् दशभिः शरैः ॥ ५२ ॥

द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानस्तु सप्तभिः ।

भीमसेनश्चतुःषष्ट्या सहदेवश्च सप्तभिः ॥ ५३ ॥

नकुलस्त्रिंशता बाणैः शतानीकस्तु सप्तभिः ।

शिखण्डी दशभिर्वीरो धर्मराजः शतेन तु ॥ ५४ ॥

तदनन्तर धृष्टद्युम्नने कर्णको दस बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर,

सात्यकिने सात, भीमसेनने चौंसठ, सहदेवने सात, नकुलने तीस, शतानीकने सात,

शिखण्डीने दस और वीर धर्मराज युधिष्ठिरने सौ बाण कर्णको मारे ॥ ५२-५४ ॥

एते चान्ये च राजेन्द्र प्रवीरा जयगृद्धिनः ।

अभ्यर्दयन् महेष्वासं सूतपुत्रं महामृधे ॥ ५५ ॥