भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1952

साश्वसूतरथच्छत्रांस्ततस्ते विवरं ददुः ॥ ६१ ॥ फिर दस-दस बाणोंसे घोड़ों, सारथि, रथ और छत्रोंसहित इन सबको घायल करके कर्णने सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया। फिर तो उन शत्रुओंने उसे आगे बढ़नेके लिये जगह दे दी ॥ ६१ ॥ तान् प्रमथ्य महेष्वासान् राधेयः शरवृष्टिभिः । राजानीकमसम्बाधं प्राविशच्छत्रुकर्शनः ॥ ६२ ॥ शत्रुओंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उन महाधनुर्धरोंको रौंदकर राजा युधिष्ठिरकी सेनामें बेरोक-टोक प्रवेश किया ॥ ६२ ॥ स रथांस्त्रिशतं हत्वा चेदीनामनिवर्तिनाम् । राधेयो निशितैर्बाणैस्ततोऽभ्यार्च्छद् युधिष्ठिरम् ॥ ६३ ॥ उसने युद्धसे पीछे न हटनेवाले तीन सौ चेदिदेशीय रथियोंको अपने पैने बाणोंद्वारा मारकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ६३ ॥ ततस्ते पाण्डवा राजन् शिखण्डी च ससात्यकिः । राधेयात् परिरक्षन्तो राजानं पर्यवारयन् ॥ ६४ ॥ राजन्! तब पाण्डवों, शिखण्डी और सात्यकिने राधापुत्र कर्णसे राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करनेके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ ६४ ॥ तथैव तावकाः सर्वे कर्णं दुर्वारणं रणे । यत्ताः शूरा महेष्वासाः पर्यरक्षन्त सर्वशः ॥ ६५ ॥ इसी प्रकार आपके सभी महाधनुर्धर शूरवीर योद्धा रणमें अनिवार्य गतिसे विचरनेवाले कर्णकी सब ओरसे प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे ॥ ६५ ॥ नानावादित्रघोषाश्च प्रादुरासन् विशाम्पते । सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणामभिगर्जताम् ॥ ६६ ॥ प्रजानाथ! उस समय नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनि होने लगी और सब ओरसे गर्जना करनेवाले शूरवीरोंका सिंहनाद सुनायी देने लगा ॥ ६६ ॥ ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः । युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर पुनः कौरव और पाण्डव योद्धा निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये। एक ओर युधिष्ठिर आदि कुन्तीपुत्र थे और दूसरी ओर कर्ण आदि हमलोग ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७२ १/२ श्लोक हैं)