भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1959

(ततः पुनरमेयात्मा चेदीनां प्रवरान् दश । न्यहनद् भरतश्रेष्ठ कर्णो वैकर्तनस्तदा ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न वैकर्तन कर्णने चेदिदेशके दस प्रधान वीरोंको पुनः मार डाला। तस्य बाणसहस्राणि सम्प्रपन्नानि मारिष । दृश्यन्ते दिक्षु सर्वासु शलभानामिव व्रजाः ॥ माननीय नरेश! कर्णके गिरते हुए सहस्रों बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें टिड्डीदलोंके समान दिखायी देते थे। कर्णनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः सुतेजनाः । नराश्वकायान् निर्भिद्य पेतुरुर्व्यां समन्ततः ॥ उसके नामसे अंकित सुवर्णमय पंखवाले तेज बाण मनुष्यों और घोड़ोंके शरीरोंको विदीर्ण करके सब ओरसे पृथ्वीपर गिरने लगे। कर्णेनैकेन समरे चेदीनां प्रवरा रथाः । संजयानां च सर्वेषां शतशो निहता रणे ॥ समरांगणमें अकेले कर्णने चेदिदेशके प्रधान रथियोंका तथा सम्पूर्ण सृंजयोंके सैकड़ों योद्धाओंका भी संहार कर डाला। कर्णस्य शरसंछन्नं बभूव विपुलं तमः । नाज्ञायत ततः किञ्चित् परेषामात्मनोऽपि वा ॥ कर्णके बाणोंसे सारी दिशाएँ ढक जानेके कारण वहाँ महान् अन्धकार छा गया। उस समय शत्रुपक्षकी तथा अपने पक्षकी भी कोई वस्तु पहचानी नहीं जाती थी। तस्मिंस्तमसि भूते च क्षत्रियाणां भयंकरे । विचचार महाबाहुर्निर्दहन् क्षत्रियान् बहून् ॥) शत्रुओंके लिये भयदायक उस घोर अन्धकारमें महाबाहु कर्ण बहुसंख्यक राजपूतोंको दग्ध करता हुआ विचरने लगा। ततः शरमहाज्वालो वीर्योष्मा कर्णपावकः । निर्दहन् पाण्डववनं वीरः पर्यचरद् रणे ॥ ३९ ॥ उस समय वीर कर्ण अग्निके समान हो रहा था। बाण ही उसकी ऊँचेतक उठती हुई ज्वालाओंके समान थे, पराक्रम ही उसका ताप था और वह पाण्डवरूपी वनको दग्ध करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा था ।। ३९ ।। (ततस्तेषां महाराज पाण्डवानां महारथाः । सृञ्जयानां च सर्वेषां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ अस्त्रैः कर्णं महेष्वासं समन्तात् पर्यवारयन् ।)