महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1976, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनेन सुनृशंसेन समवेतेषु राजसु ।। अस्माकं शृण्वतां कृष्णा यानि वाक्यानि मातुल । असह्यानि च नीचेन बहूनि श्रावितानि भोः ।। नूनं चैतत् परिज्ञातं दूरस्थस्यापि पार्थिव । छेदनं चास्य जिह्वायास्तदेवाकाङ्क्षितं मया ।। मामाजी! इस नीच नृशंसने जहाँ बहुत-से राजा एकत्र हुए थे, वहाँ हमारे सुनते हुए द्रौपदीके प्रति बहुत-से असह्य कटुवचन सुनाये थे। राजन्! आप दूर होनेपर भी निश्चय ही यह समझ गये हैं कि मेरे द्वारा इसकी जीभ काटी जानेवाली है। वास्तवमें इस समय मैंने इसकी जीभ काटनेकी ही इच्छा की थी। राज्ञस्तु प्रियकामेन कालोऽयं परिपालितः । भवता तु यदुक्तोऽस्मि वाक्यं हेत्वर्थसंहितम् ।। तद् गृहीतं महाराज कटुकस्थमिवौषधम् । केवल राजा युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये मैंने आजतक प्रतीक्षा की है। महाराज! आपने जो युक्तियुक्त बात मुझसे कही है, उसे कड़वी दवाके समान मैंने ग्रहण कर लिया है। हीनप्रतिज्ञो बीभत्सुर्न हि जीवेत् कहिंचित् ।। अस्मिन् विनष्टे नष्टाः स्मः सर्व एव सकेशवाः । क्योंकि यदि अर्जुनकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी तो वे कभी जीवित नहीं रह सकेंगे; उनके नष्ट होनेपर श्रीकृष्णसहित हम सब लोग भी नष्ट ही हो जायँगे। अद्य चैव नृशंसात्मा पापः पापकृतां वरः ।। गमिष्यति पराभावं दृष्टमात्रः किरीटिना । आज किरीटधारी अर्जुनकी दृष्टि पड़ते ही यह पापाचारियोंमें श्रेष्ठ पापात्मा क्रूर कर्ण पराभवको प्राप्त हो जायगा। युधिष्ठिरस्य कोपेन पूर्वं दग्धो नृशंसकृत् ।। त्वया संरक्षितस्त्वस्य मत्समीपादुपायतः ॥) यह नृशंस कर्ण महाराज युधिष्ठिरके क्रोधसे पहले ही दग्ध हो चुका था। आज आपने उचित उपायद्वारा मेरे निकटसे इसकी रक्षा कर ली है। ततो मद्राधिपो दृष्ट्वा विसंज्ञं सूतनन्दनम् । अपोवाह रथेनाजौ कर्णमाहवशोभिनम् ।। ४८ ।। तदनन्तर मद्रराज शल्य संग्राममें शोभा पानेवाले सूतपुत्र कर्णको अचेत हुआ देख रथके द्वारा युद्धस्थलसे दूर हटा ले गये ।। ४८ ।। ततः पराजिते कर्णे धातराष्ट्रीं महाचमूम् । व्यद्रावयद् भीमसेनो यथेन्द्रो दानवान् पुरा ।। ४९ ।।