महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1992, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और कौरव-सेनाका व्यथित होना
संजय उवाच
क्षत्रियास्ते महाराज परस्परवधैषिणः ।
अन्योन्यं समरे जघ्नुः कृतवैराः परस्परम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वे क्षत्रिय परस्पर वैरभाव रखकर समरांगणमें एक-दूसरेको मारने लगे ॥ १ ॥
रथौघाश्च ह्यौघाश्च नरौघाश्च समन्ततः ।
गजौघाश्च महाराज संसक्ताश्च परस्परम् ॥ २ ॥
राजेन्द्र! रथसमूह, अश्वसमूह, हाथियोंके झुंड और पैदल मनुष्योंके समुदाय सब ओर एक-दूसरेसे उलझे हुए थे ॥ २ ॥
गदानां परिघाणां च कणपानां च क्षिप्यताम् ।
प्रासानां भिन्दिपालानां भुशुण्डीनां च सर्वशः ॥ ३ ॥
सम्पातं चानुपश्याम संग्रामे भृशदारुणे ।
शलभा इव सम्पेतुः समन्ताच्छरवृष्टयः ॥ ४ ॥
उस अत्यन्त दारुण संग्राममें हमलोग निरन्तर चलाये जानेवाले परिघों, गदाओं, कणपों, प्रासों, भिन्दिपालों और भुशुण्डियोंकी धारा-सी गिरती देख रहे थे। सब ओर टिड्डी-दलोंके समान बाणोंकी वर्षा हो रही थी ॥ ३-४ ॥
नागान् नागाः समासाद्य व्यधमन्त परस्परम् ।
हया हयांश्च समरे रथिनो रथिनस्तथा ॥ ५ ॥
पत्तयः पत्तिसंघांश्च हयसंघांश्च पत्तयः ।
पत्तयो रथमातङ्गान् रथा हस्त्यश्वमेव च ॥ ६ ॥
नागाश्च समरे त्र्यङ्गं ममृदुः शीघ्रगा नृप ।
हाथी हाथियोंसे भिड़कर एक-दूसरेको संताप देने लगे। उस समरांगणमें घोड़े घोड़ों, रथी रथियों एवं पैदल पैदलसमूहों, अश्वसमुदायों तथा रथों और हाथियोंका भी मर्दन कर रहे थे। नरेश्वर! इसी प्रकार रथी हाथी और घोड़ोंका तथा शीघ्रगामी हाथी उस युद्धस्थलमें हाथी सेनाके अन्य तीन अंगोंको रौंदने लगे ॥ ५-६ १/२ ॥
वध्यतां तत्र शूराणां क्रोशतां च परस्परम् ॥ ७ ॥