महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1997, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रावयाणाश्च बहवस्तत्र योद्धा विशाम्पते ।
अन्योन्यमवमृद्नन्तः शक्तितोमरपट्टिशैः ॥ ४१ ॥
भारत! प्रभो! रणभूमिमें कितने ही योद्धा एक-दूसरेको अपने और पिताके नाम तथा गोत्र सुनाते थे। प्रजानाथ! नाम और गोत्र सुनाते हुए बहुतेरे योद्धा शक्ति, तोमर और पट्टिशोंद्वारा एक-दूसरेको धूलमें मिला रहे थे ॥
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे सुदारुणे ।
व्यषीदत् कौरवी सेना भिन्ना नौरिव सागरे ॥ ४२ ॥
इस प्रकार वह दारुण एवं भयंकर युद्ध चल ही रहा था कि समुद्रमें टूटी हुई नौकाके समान कौरव-सेना छिन्न-भिन्न हो गयी और विषाद करने लगी ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥