महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2009, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइससे कृपाचार्य अत्यन्त कुपित हो उठे। उन्होंने दूसरा नूतन सुदृढ़ धनुष लेकर सुकेतुके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें तीस बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ २६ ॥ स विह्वलितसर्वाङ्गः प्रचचाल रथोत्तमे । भूमिकम्पे यथा वृक्षश्चचाल कम्पितो भृशम् ॥ २७ ॥ इससे सुकेतुका सारा शरीर विह्वल होकर उस उत्तम रथपर काँपने लगा; मानो भूकम्प आनेपर कोई वृक्ष जोर-जोरसे काँपने और झूमने लगा हो ॥ २७ ॥ चलतस्तस्य कायात् तु शिरो ज्वलितकुण्डलम् । सोष्णीषं सशिरस्त्राणं क्षुरप्रेण त्वपातयद् ॥ २८ ॥ उसी अवस्थामें कृपाचार्यने एक क्षुरप्रद्वारा सुकेतुके जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त पगड़ी और शिरस्त्राणसहित मस्तकको उसकी काँपती हुई कायासे काट गिराया ॥ २८ ॥ तच्छिरः प्रापतद् भूमौ श्येनाहृतमिवामिषम् । ततोऽस्य कायो वसुधां पश्चात् प्रापतदच्युत ॥ २९ ॥ राजन्! वह सिर बाजके लाये हुए मांसके टुकड़ेके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके बाद सुकेतुका धड़ भी धराशायी हो गया ॥ २९ ॥ तस्मिन् हते महाराज त्रस्तास्तस्य पुरोगमाः । गौतमं समरे त्यक्त्वा दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ ३० ॥ महाराज! सुकेतुके मारे जानेपर उसके अग्रगामी सैनिक भयभीत हो समरांगणमें कृपाचार्यको छोड़कर दसों दिशाओंकी ओर भाग निकले ॥ ३० ॥ धृष्टद्युम्नं तु समरे संनिवार्य महारथः । कृतवर्माब्रवीद्धृष्टस्तिष्ठ तिष्ठेति भारत ॥ ३१ ॥ भारत! दूसरी ओर महारथी कृतवर्माने समरांगणमें धृष्टद्युम्नको रोककर बड़े हर्षके साथ कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ३१ ॥ तदभूत् तुमुलं युद्धं वृष्णिपार्षतयो रणे । आमिषार्थे यथा युद्धं श्येनयोः क्रुद्धयोर्नृप ॥ ३२ ॥ नरेश्वर! जैसे मांसके टुकड़ेके लिये दो बाज क्रोधपूर्वक लड़ रहे हों, उसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें कृतवर्मा और धृष्टद्युम्नका घोर युद्ध होने लगा ॥ ३२ ॥ धृष्टद्युम्नस्तु समरे हार्दिक्यं नवभिः शरैः । आजघानोरसि क्रुद्धः पीडयन् हृदिकात्मजम् ॥ ३३ ॥ धृष्टद्युम्नने कुपित होकर कृतवर्माको पीड़ा देते हुए उसकी छातीमें नौ बाण मारे ॥ ३३ ॥ कृतवर्मा तु समरे पार्षतेन दृढाहतः । पार्षतं सरथं साश्वं छादयामास सायकैः ॥ ३४ ॥