भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2016, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2016

युधिष्ठिरस्तु त्वरितो द्रोणशिष्यो महारथः ।। ३१ ।।
अब्रवीद् द्रोणपुत्राय रोषामर्षसमन्वितः ।
तदनन्तर रोष और अमर्षमें भरे हुए द्रोणशिष्य महारथी युधिष्ठिरने द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे कहा ।।

(युधिष्ठिर उवाच
जानामि त्वां युधि श्रेष्ठं वीर्यवन्तं महाबलम् ।
कृतास्त्रं कृतिनं चैव तथा लघुपराक्रमम् ।।
**युधिष्ठिर बोले—**द्रोणकुमार! मैं जानता हूँ कि तुम युद्धमें पराक्रमी, महाबली, अस्त्रवेत्ता, विद्वान् और शीघ्रतापूर्वक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले श्रेष्ठ वीर हो।
बलमेतद् भवान् सर्वं पार्षते यदि दर्शयेत् ।
ततस्त्वां बलवन्तं च कृतविद्यं च विद्महे ।।
परंतु यदि तुम अपना यह सारा बल द्रुपदपुत्रपर दिखा सको तो हम समझेंगे कि तुम बलवान् तथा अस्त्र-विद्याके विद्वान् हो।
न हि वै पार्षतं दृष्ट्वा समरे शत्रुसूदनम् ।
भवेत् तव बलं किंचिद् ब्रवीमि त्वा न तु द्विजम् ॥)
शत्रुसूदन धृष्टद्युम्नको समरभूमिमें देखकर तुम्हारा बल कुछ भी काम न करेगा। (तुम्हारे कर्मको देखते हुए) मैं तुम्हें ब्राह्मण नहीं कहूँगा।
नैव नाम तव प्रीतिर्नैव नाम कृतज्ञता ।। ३२ ।।
यतस्त्वं पुरुषव्याघ्र मामेवाद्य जिघांससि ।
पुरुषसिंह! तुम जो आज मुझे ही मार डालना चाहते हो, यह न तो तुम्हारा प्रेम है और न कृतज्ञता ।। ३२ ½ ।।
ब्राह्मणेन तपः कार्यं दानमध्ययनं तथा ।। ३३ ।।
क्षत्रियेण धनुर्नाम्यं स भवान् ब्राह्मणब्रुवः ।
ब्राह्मणको तप, दान और वेदाध्ययन करना चाहिये। धनुष झुकाना तो क्षत्रियका काम है; अतः तुम नाममात्रके ब्राह्मण हो ।। ३३ ½ ।।
मिषतस्ते महाबाहो युधि जेष्यामि कौरवान् ।। ३४ ।।
कुरुष्व समरे कर्म ब्रह्मबन्धुरसि ध्रुवम् ।
महाबाहो! आज मैं तुम्हारे देखते-देखते युद्धमें कौरवोंको जीतूँगा। तुम समरमें पराक्रम प्रकट करो। निश्चय ही तुम एक स्वधर्मभ्रष्ट ब्राह्मण हो ।। ३४ ½ ।।
एवमुक्तो महाराज द्रोणपुत्रः स्मयन्निव ।। ३५ ।।
युक्तं तत्त्वं च संचिन्त्य नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ।

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