महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूतपुत्र कर्णके रथके मार्गमें सब ओर गिरते हुए हाथियों, घोड़ों, मनुष्यों और रथोंके द्वारा वहाँ सारी पृथ्वी पट गयी थी ।। ५३ १/२ ।।
नैवं भीष्मो न च द्रोणो नान्ये युधि च तावकाः ।। ५४ ।।
चक्रुः स्म तादृशं कर्म यादृशं वै कृतं रणे ।
कर्णने उस समय रणभूमिमें जैसा पराक्रम किया था, वैसा न तो भीष्म, न द्रोणाचार्य और न आपके दूसरे कोई योद्धा ही कर सके थे ।। ५४ १/२ ।।
सूतपुत्रेण नागेषु हयेषु च रथेषु च ।। ५५ ।।
नरेषु च महाराज कृतं स्म कदनं महत् ।
महाराज! सूतपुत्रने हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल मनुष्योंके दलमें घुसकर बड़ा भारी संहार मचा दिया था ।। ५५ १/२ ।।
मृगमध्ये यथा सिंहो दृश्यते निर्भयश्चरन् ।। ५६ ।।
पञ्चालानां तथा मध्ये कर्णोऽचरदभीतवत् ।
जैसे सिंह मृगोंके झुंडमें निर्भय विचरता दिखायी देता है, उसी प्रकार कर्ण पांचालोंकी सेनामें निर्भीकके समान विचरण करता था ।। ५६ १/२ ।।
यथा मृगगणांस्त्रस्तान् सिंहो द्रावयते दिशः ।। ५७ ।।
पञ्चालानां रथव्रातान् कर्णो व्यद्रावयत् तथा ।
जैसे भयभीत हुए मृगसमूहोंको सिंह सब ओर खदेड़ता है, उसी प्रकार कर्ण पांचालोंके रथसमूहोंको भगा रहा था ।। ५७ १/२ ।।
सिंहास्यं च यथा प्राप्य न जीवन्ति मृगाः क्वचित् ।। ५८ ।।
तथा कर्णमनुप्राप्य न जिजीवुर्महारथाः ।
जैसे मृग सिंहके मुखके समीप पहुँचकर जीवित नहीं बचते, उसी प्रकार पांचाल महारथी कर्णके निकट पहुँचकर जीवित नहीं रह पाते थे ।। ५८ १/२ ।।
वैश्वानरं यथा प्राप्य प्रतिदह्यन्ति वै जनाः ।। ५९ ।।
कर्णाग्निना रणे तद्वद् दग्धा भारत सृञ्जयाः ।
भरतनन्दन! जैसे जलती आगमें पड़ जानेपर सभी मनुष्य दग्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार सृंजय-सैनिक रणभूमिमें कर्णरूपी अग्निसे जलकर भस्म हो गये ।।
कर्णेन चेदिकैकेयपाञ्चालेषु च भारत ।। ६० ।।
विश्राव्य नाम निहता बहवः शूरसम्मताः ।
भारत! कर्णने चेदि, केकय और पांचाल योद्धाओंमेंसे बहुत-से शूरसम्मत रथियोंको नाम सुनाकर मार डाला ।।
मम चासीन्मती राजन् दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ।। ६१ ।।
नैकोऽप्याधिरथेर्जीवन् पाञ्चाल्यो मोक्ष्यते युधि ।