भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2032, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2032

ततो विद्युतप्रभैर्बाणैः कार्तस्वरविभूषितैः । निरन्तरमिवाकाशमासीच्छन्नं किरीटिना ॥ १०२ ॥ तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए विद्युत्के समान प्रकाशमान सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा आच्छादित हो आकाश ठसाठस भर गया ॥ १०२ ॥

किरीटिभुजनिर्मुक्तैः सम्पतद्भिर्महाशरैः । समाच्छन्नं बभौ सर्वं काद्रवेयैरिव प्रभो ॥ १०३ ॥ प्रभो! किरीटधारी अर्जुनकी भुजाओंसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले बड़े-बड़े बाणोंसे आवृत होकर वहाँका सारा प्रदेश सर्पोंसे व्याप्त-सा प्रतीत हो रहा था ॥ १०३ ॥

रुक्मपुङ्खान् प्रसन्नाग्रान् शरान् संनतपर्वणः । अवासृजदमेयात्मा दिक्षु सर्वासु पाण्डवः ॥ १०४ ॥ अमेय आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डुनन्दन अर्जुन सम्पूर्ण दिशाओंमें सुवर्णमय पंख, स्वच्छ धार और झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ १०४ ॥

मही वियद् दिशः सर्वाः समुद्रा गिरयोऽपि वा । स्फुटन्तीति जना जज्ञुः पार्थस्य तलनिःस्वनात् ॥ १०५ ॥ वहाँ सब लोग यही समझने लगे कि 'अर्जुनके तलशब्द (हथेलीकी आवाज)-से पृथ्वी, आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ, समुद्र और पर्वत भी फटे जा रहे हैं' ॥ १०५ ॥

हत्वा दशसहस्राणि पार्थिवानां महारथः । संशप्तकानां कौन्तेयः प्रत्यक्षं त्वरितोऽभ्ययात् ॥ १०६ ॥ महारथी कुन्तीकुमार अर्जुन सबके देखते-देखते दस हजार संशप्तक नरेशोंका वध करके तुरंत आगे बढ़ गये ॥ १०६ ॥

प्रत्यक्षं च समासाद्य पार्थः काम्बोजरक्षितम् । प्रममाथ बलं बाणैर्दानवानिव वासवः ॥ १०७ ॥ जैसे इन्द्रने दानवोंका विनाश किया था, उसी प्रकार अर्जुनने हमारी आँखोंके सामने काम्बोजराजके द्वारा सुरक्षित सेनाके पास पहुँचकर अपने बाणोंद्वारा उसका संहार कर डाला ॥ १०७ ॥

प्रचिच्छेदाशु भल्लेन द्विषतामाततायिनाम् । शस्त्रं पाणिं तथा बाहुं तथापि च शिरांस्युत ॥ १०८ ॥ वे अपने भल्लके द्वारा आततायी शत्रुओंके शस्त्र, हाथ, भुजा तथा मस्तकोंको बड़ी फुर्तीसे काट रहे थे ॥ १०८ ॥

अङ्गाङ्गावयवैश्छिन्नैर्व्यायुधास्तेऽपतन् भुवि । विष्वग्वाताभिसम्भग्ना बहुशाखा इव द्रुमाः ॥ १०९ ॥ जैसे सब ओरसे उठी हुई आँधीके उखाड़े हुए अनेक शाखाओंवाले वृक्ष धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार अपने शरीरका एक-एक अवयव कट जानेसे वे शस्त्रहीन शत्रु भूतलपर