महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2051, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! तब कर्णने अत्यन्त कुपित हो धृष्टद्युम्नपर द्वितीय मृत्युदण्डके समान एक सुवर्ण-भूषित बाण चलाया ॥ १४ ॥ तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते । चिच्छेद शतधा राजञ्शैनैयः कृतहस्तवत् ॥ १५ ॥ प्रजानाथ! नरेश! सहसा आते हुए उस भयंकर बाणके सात्यकिने सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति सौ टुकड़े कर डाले ॥ १५ ॥ दृष्ट्वा विनिहतं बाणं शरैः कर्णो विशाम्पते । सात्यकिं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयत् ॥ १६ ॥ प्रजापालक नरेश! सात्यकिके बाणोंसे अपने बाणको नष्ट हुआ देख कर्णने चारों ओरसे बाण बरसाकर सात्यकिको ढक दिया ॥ १६ ॥ विव्याध चैनं समरे नाराचैस्तत्र सप्तभिः । तं प्रत्यविध्यच्छैनैयः शरैर्हेमपरिष्कृतैः ॥ १७ ॥ साथ ही समरांगणमें सात नाराचोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया। तब सात्यकिने भी सुवर्णभूषित बाणोंसे कर्णको घायल करके बदला चुकाया ॥ १७ ॥ ततो युद्धं महाराज चक्षुःश्रोत्रभयानकम् । आसीद् घोरं च चित्रं च प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ १८ ॥ महाराज! तब नेत्रोंसे देखने और कानोंसे सुननेपर भी भय उत्पन्न करनेवाला घोर एवं विचित्र युद्ध छिड़ गया, जो सब ओरसे देखने ही योग्य था ॥ १८ ॥ सर्वेषां तत्र भूतानां लोमहर्षोऽभ्यजायत । तद् दृष्ट्वा समरे कर्म कर्णशैनैययोर्नृप ॥ १९ ॥ नरेश्वर! समरभूमिमें कर्ण और सात्यकिका वह कर्म देखकर समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १९ ॥ एतस्मिन्नन्तरे द्रौणिरभ्ययात् सुमहाबलम् । पार्षतं शत्रुदमनं शत्रुवीर्यासुनाशनम् ॥ २० ॥ इसी समय शत्रुओंके बल और प्राणोंका नाश करनेवाले शत्रुसूदन महाबली धृष्टद्युम्नके पास द्रोणकुमार अश्वत्थामा आ पहुँचा ॥ २० ॥ अभ्यभाषत संक्रुद्धो द्रौणिः परपुरंजयः । तिष्ठ तिष्ठाद्य ब्रह्मघ्न न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ २१ ॥ शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाला द्रोणपुत्र अश्वत्थामा वहाँ पहुँचते ही अत्यन्त कुपित होकर बोला—‘ब्रह्महत्या करनेवाले पापी! खड़ा रह, खड़ा रह, आज तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा’ ॥ २१ ॥ इत्युक्त्वा सुभृशं वीरं शीघ्रकृन्निशितैः शरैः । पार्षतं छादयामास घोररूपैः सुतेजनैः ॥ २२ ॥