भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2056

द्रौणेरास्यमनुप्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा ॥ ४९ ॥ 'महाबाहो! शत्रुसूदन! जैसे कोई मौतके मुखमें पड़ गया हो, उसी प्रकार अश्वत्थामाके मुखमें पहुँचे हुए धृष्टद्युम्नको छुड़ाओ' ॥ ४९ ॥ एवमुक्त्वा महाराज वासुदेवः प्रतापवान् । प्रैषयत् तुरगांस्तत्र यत्र द्रौणिर्व्यवस्थितः ॥ ५० ॥ महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अपने घोड़ोंको उसी ओर हाँका जहाँ द्रोणकुमार अश्वत्थामा खड़ा था ॥ ५० ॥ ते हयाश्चन्द्रसंकाशाः केशवेन प्रचोदिताः । आपिबन्त इव व्योम जग्मुर्द्रोणिरथं प्रति ॥ ५१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये वे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले घोड़े अश्वत्थामाके रथकी ओर इस प्रकार दौड़े, मानो आकाशको पीते जा रहे हों ॥ ५१ ॥ दृष्ट्वाऽऽयातौ महावीर्यावुभौ कृष्णधनंजयौ । धृष्टद्युम्नवधे यत्नं चक्रे राजन् महाबलः ॥ ५२ ॥ राजन्! महापराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको आते देख महाबली अश्वत्थामा धृष्टद्युम्नके वधके लिये विशेष प्रयत्न करने लगा ॥ ५२ ॥ विकृष्यमाणं दृष्ट्वैव धृष्टद्युम्नं नरेश्वर । शरांश्चिक्षेप वै पार्थो द्रौणिं प्रति महाबलः ॥ ५३ ॥ नरेश्वर! धृष्टद्युम्नको खींचे जाते देख महाबली अर्जुनने अश्वत्थामापर बहुत-से बाण चलाये ॥ ५३ ॥ ते शरा हेमविकृता गाण्डीवप्रेषिता भृशम् । द्रौणिमासाद्य विविशुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ५४ ॥ गाण्डीव धनुषसे वेगपूर्वक छूटे हुए वे सुवर्ण-निर्मित बाण अश्वत्थामाके पास पहुँचकर उसके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे सर्प बाँबीमें प्रवेश करते हैं ॥ ५४ ॥ स विद्धस्तैः शरैर्घोरैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । उत्सृज्य समरे राजन् पाञ्चाल्यममितौजसम् ॥ ५५ ॥ रथमारुरुहे वीरो धनंजयशरार्दितः । प्रगृह्य च धनुः श्रेष्ठं पार्थं विव्याध सायकैः ॥ ५६ ॥ राजन्! उन भयंकर बाणोंसे घायल हुआ प्रतापी वीर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरांगणमें अमित बलशाली धृष्टद्युम्नको छोड़कर अपने रथपर जा चढ़ा। वह धनंजयके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो चुका था; इसलिये उसने भी श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर बाणोंद्वारा अर्जुनको घायल कर दिया ॥ ५५-५६ ॥ एतस्मिन्नन्तरे वीरः सहदेवो जनाधिप । अपोवाह रथेनाजौ पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ ५७ ॥