महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2063, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहस्तिकक्ष्यां रणे पश्य चरन्तीं तत्र तत्र ह । रथस्थं सूतपुत्रस्य केतुं केतुमतां वर ॥ ३१ ॥ ‘ध्वज धारण करनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! देखो, सूतपुत्रके रथपर कैसी ध्वजा फहरा रही है? हाथीकी रस्सीके चिह्नसे युक्त उसकी पताका रणभूमिमें यत्र-तत्र कैसे विचरण कर रही है ॥ ३१ ॥
असौ धावति राधेयो भीमसेनरथं प्रति । किरञ्शरशतान्येव विनिघ्नंस्तव वाहिनीम् ॥ ३२ ॥ ‘वह राधापुत्र कर्ण सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके तुम्हारी सेनाका संहार करता हुआ भीमसेनके रथपर धावा कर रहा है ॥ ३२ ॥
एतान् पश्य च पञ्चालान् द्राव्यमाणान् महारथान् । शक्रेणेव यथा दैत्यान् हन्यमानान् महाहवे ॥ ३३ ॥ ‘जैसे देवराज इन्द्र दैत्योंको खदेड़ते और मारते हैं, उसी प्रकार महासमरमें कर्णके द्वारा खदेड़े और मारे जानेवाले इन पांचाल महारथियोंको देखो ॥ ३३ ॥
एष कर्णो रणे जित्वा पञ्चालान् पाण्डुसृञ्जयान् । दिशो विप्रैक्षते सर्वास्त्वदर्थमिति मे मतिः ॥ ३४ ॥ ‘यह कर्ण रणभूमिमें पांचालों, पाण्डवों और सृंजयोंको जीतकर अब तुम्हें परास्त करनेके लिये सारी दिशाओंमें दृष्टिपात कर रहा है; ऐसा मेरा मत है ॥ ३४ ॥
पश्य पार्थ धनुः श्रेष्ठं विकर्षन् साधु शोभते । शत्रुं जित्वा यथा शक्रो देवसंघैः समावृतः ॥ ३५ ॥ ‘अर्जुन! देखो, जैसे देवराज इन्द्र शत्रुपर विजय पाकर देवसमूहोंसे घिरे हुए शोभा पाते हैं, उसी प्रकार यह कर्ण कौरवोंके बीचमें अपने श्रेष्ठ धनुषको खींचता हुआ सुशोभित हो रहा है— ॥ ३५ ॥
एते नर्दन्ति कौरव्या दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् । त्रासयन्तो रणे पाण्डून् सृञ्जयांश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥ ‘कर्णका पराक्रम देखकर ये कौरवयोद्धा रणभूमिमें पाण्डवों और सृंजयोंको सब ओरसे डराते हुए जोर-जोरसे गर्जना करते हैं ॥ ३६ ॥
एष सर्वात्मना पाण्डूंस्त्रासयित्वा महारणे । अभिभाषति राधेयः सर्वसैन्यानि मानद ॥ ३७ ॥ ‘मानद! यह राधापुत्र कर्ण महासमरमें पाण्डव-सैनिकोंको सर्वथा भयभीत करके अपनी सम्पूर्ण सेनाओंसे इस प्रकार कह रहा है ॥ ३७ ॥
अभिद्रवत भद्रं वो द्रुतं द्रवत कौरवाः । यथा जीवन्न वः कश्चिन्मुच्येत युधि सृञ्जयः ॥ ३८ ॥ तथा कुरुत संयत्ता वयं यास्याम पृष्ठतः ।