भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2070

'पार्थ! तुम्हारे बड़े भाई भीमसेनने अपने पैने बाणोंसे ध्वजसहित वैजयन्ती पताकाओंको नष्ट करके उनचास हाथियोंको काट गिराया है ।। ८४ ।।

दशभिर्दशभिश्चैको नाराचैर्निहतो गजः ।
न चासौ धार्तराष्ट्राणां श्रूयते निनदस्तथा ।। ८५ ।।
पुरंदरसमे क्रुद्धे निवृत्ते भरतर्षभ ।
'उन्होंने दस-दस नाराचोंसे एक-एक हाथीका वध किया है। भरतभूषण! इन्द्रके समान पराक्रमी भीमसेनके क्रोधपूर्वक लौटनेपर धृतराष्ट्रपुत्रोंका वह सिंहनाद अब नहीं सुनायी दे रहा है ।। ८५ १/२ ।।

अक्षौहिण्यस्तथा तिस्रो धार्तराष्ट्रस्य संहताः ।
क्रुद्धेन भीमसेनेन नरसिंहेन वारिताः ।। ८६ ।।
'कुपित हुए पुरुषसिंह भीमसेनने दुर्योधनकी संगठित हुई तीन अक्षौहिणी सेनाओंको आगे बढ़नेसे रोक दिया है ।।

न शक्नुवन्ति वै पार्थ पार्थिवाः समुदीक्षितुम् ।
मध्यंदिनगतं सूर्यं यथा दुर्बलचक्षुषः ।। ८७ ।।
'जैसे दुर्बल नेत्रोंवाले प्राणी दोपहरके सूर्यकी ओर नहीं देख सकते, उसी प्रकार राजा लोग कुन्तीकुमार भीमसेनकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पा रहे हैं ।। ८७ ।।

एते भीमस्य संत्रस्ताः सिंहस्येवेतरे मृगाः ।
शरैः संत्रासिताः संख्ये न लभन्ते सुखं क्वचित् ।। ८८ ।।
जैसे सिंहसे डरे हुए दूसरे मृग चैन नहीं पाते हैं, उसी प्रकार ये भीमसेनके बाणोंसे भयभीत हुए कौरव-सैनिक युद्धस्थलमें कहीं सुख नहीं पा रहे हैं ।। ८८ ।।

(राजानं च महाबाहुं पीडयन्त्यात्तमन्यवः ।
राधेयो बहुभिः सार्धमसौ गच्छति वेगतः ।।
वर्जयित्वा तु भीमं तं पार्श्वतो ह्यानयन् धनुः ।
तं पालयन् महाराजं धार्तराष्ट्रं बलान्वितः ।।)
'पाण्डव-सैनिक क्रोधमें भरकर महाबाहु दुर्योधनको पीड़ा दे रहे हैं। बलशाली राधापुत्र कर्ण भीमसेनको छोड़कर बगलमें धनुष लिये महाराज दुर्योधनकी रक्षाके लिये बहुतेरे सैनिकोंके साथ वेगपूर्वक उसके पास जा रहा है।'

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा महाबाहुर्वासुदेवाद् धनंजयः ।
भीमसेनेन तत् कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ।। ८९ ।।
अर्जुनो व्यधमच्छिष्टानहितान् निशितैः शरैः ।