महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2096, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! तब महारथी द्रोणपुत्रने कुपित होकर अर्जुनपर ऐन्द्रास्त्रद्वारा वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ तस्येन्द्रजालावततं समीक्ष्य पार्थो राजन् गाण्डिवमाददे सः । ऐन्द्रं जालं प्रत्यहरत् तरस्वी वरास्त्रमादाय महेन्द्रसृष्टम् ॥ २४ ॥ राजन्! अर्जुनने अश्वत्थामाद्वारा किये हुए इन्द्रजालका विस्तार देखकर बड़े वेगसे गाण्डीव धनुष हाथमें लिया और महेन्द्रद्वारा निर्मित उत्तम अस्त्रका आश्रय लेकर उस इन्द्रजालका संहार कर दिया ॥ २४ ॥ विदार्य तज्जालमथेन्द्रमुक्तं पार्थस्ततो द्रौणिरथं क्षणेन । प्रच्छादयामास ततोऽभ्युपेत्य द्रौणिस्तदा पार्थशराभिभूतः ॥ २५ ॥ इस प्रकार इन्द्रास्त्रद्वारा छोड़े गये उस बाण-जालको विदीर्ण करके अर्जुनने निकटवर्ती होकर क्षणभरमें अश्वत्थामाके रथको ढक दिया। उस समय अश्वत्थामा अर्जुनके बाणोंसे अभिभूत हो गया था ॥ २५ ॥ विगाह्य तां पाण्डवबाणवृष्टिं शरैः परं नाम ततः प्रकाश्य । शतेन कृष्णं सहसाभ्यविध्यत् त्रिभिः शतैरर्जुनं क्षुद्रकाणाम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा अर्जुनकी उस बाण-वर्षाका निवारण करके अपना नाम प्रकाशित करते हुए सहसा सौ बाणोंसे श्रीकृष्णको घायल कर दिया और अर्जुनपर भी तीन सौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ततोऽर्जुनः सायकानां शतेन गुरोः सुतं मर्मसु निर्बिभेद । अश्वांश्च सूतं च तथा धनुर्ज्या- मवाकिरत् पश्यतां तावकानाम् ॥ २७ ॥ इसके बाद अर्जुनने सौ बाणोंसे गुरुपुत्रके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर दिया तथा आपके पुत्रोंके देखते-देखते उसके घोड़ों, सारथि, धनुष और प्रत्यंचापर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २७ ॥ स विद्ध्वा मर्मसु द्रौणिं पाण्डवः परवीरहा । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ २८ ॥