भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2106

हूँ ।। १३ ।।

संजय उवाच

ततो हयान् सर्वदाशार्हमुख्यः

प्रचोदयन् भीममुवाच चेदम् ।

नैतच्चित्रं तव कर्माद्य भीम

यास्याम्यहं जहि पार्थारिसंघान् ।। १४ ।।

संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सम्पूर्ण दाशार्हवंशियोंमें प्रधान भगवान् श्रीकृष्ण

अपने घोड़े हाँकते हुए वहाँ भीमसेनसे इस प्रकार बोले—'कुन्तीनन्दन भीम! आज यह

पराक्रम तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। मैं जा रहा हूँ। तुम शत्रुसमूहोंका संहार

करो' ।। १४ ।।

ततो ययौ हृषीकेशो यत्र राजा युधिष्ठिरः ।

शीघ्राच्छीघ्रतरं राजन् वाजिभिर्गुरुडोपमैः ।। १५ ।।

राजन्! यह कहकर भगवान् हृषीकेश गरुड़के समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा शीघ्र-से-

शीघ्र वहाँ जा पहुँचे, जहाँ राजा युधिष्ठिर विश्राम कर रहे थे ।। १५ ।।

प्रत्यनीके व्यवस्थाप्य भीमसेनमरिंदमम् ।

संदिश्य चैतं राजेन्द्र युद्धं प्रति वृकोदरम् ।। १६ ।।

ततस्तु गत्वा पुरुषप्रवीरौ

राजानमासाद्य शयानमेकम् ।

रथादुभौ प्रत्यवरुह्य तस्माद्

ववन्दतुर्धर्मराजस्य पादौ ।। १७ ।।

राजेन्द्र! शत्रुओंका सामना करनेके लिये शत्रुदमन वृकोदर भीमसेनको स्थापित करके

और युद्धके विषयमें उन्हें पूर्वोक्त संदेश देकर वे दोनों पुरुषशिरोमणि अकेले सोये हुए राजा

युधिष्ठिरके पास जा रथसे नीचे उतरे और उन्होंने धर्मराजके चरणोंमें प्रणाम

किया ।। १६-१७ ।।

तं दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रं क्षेमिणं पुरुषर्षभम् ।

मुदाभ्युपगतौ कृष्णावश्विनाविव वासवम् ।। १८ ।।

तावभ्यनन्दद् राजापि विवस्वानश्विनाविव ।

हते महासुरे जम्भे शक्रविष्णू यथा गुरुः ।। १९ ।।

पुरुषसिंह पुरुषप्रवर श्रीकृष्ण एवं अर्जुनको सकुशल देखकर तथा दोनों कृष्णोंको

इन्द्रके पास गये हुए अश्विनीकुमारोंके समान प्रसन्नतापूर्वक अपने समीप आया जान राजा

युधिष्ठिरने उनका उसी तरह अभिनन्दन किया, जैसे सूर्य दोनों अश्विनीकुमारोंका स्वागत