महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2115, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोऽसौ सदा श्लाघते राजमध्ये दुर्योधनं हर्षयन् दर्पपूर्णः । अहं हन्ता फाल्गुनस्येति मोहात् कच्चिद्वचस्तस्य न वै तथा तत् ॥ ३६ ॥ जो राजाओंके बीचमें दुर्योधनका हर्ष बढ़ाता हुआ घमंडमें भरकर सदा मोहवश यह डींग हाँकता था कि मैं अर्जुनका वध कर सकता हूँ। क्या उसकी वह बात आज निष्फल हो गयी? ॥ ३६ ॥
नाहं पादौ धावयिष्ये कदाचित् यावत् स्थितः पार्थ इत्यल्पबुद्धेः । व्रतं तस्यैतत् सर्वदा शक्रसूनो कच्चित् त्वया निहतः सोऽद्य कर्णः ॥ ३७ ॥ इन्द्रकुमार! उस मन्दबुद्धि कर्णने सदाके लिये यह व्रत ले रखा था कि जबतक कुन्तीकुमार अर्जुन जीवित हैं तबतक मैं दूसरोंसे पैर नहीं धुलाऊँगा। क्या उस कर्णको तुमने आज मार डाला? ॥ ३७ ॥
योऽसौ कृष्णामब्रवीद् दुष्टबुद्धिः कर्णः सभायां कुरुवीरमध्ये । किं पाण्डवांस्त्वं न जहासि कृष्णे सुदुर्बलान् पतितान् हीनसत्त्वान् ॥ ३८ ॥ जिस दुष्टबुद्धिवाले कर्णने कौरव-वीरोंके बीच भरी सभामें द्रौपदीसे कहा था कि 'कृष्णे! तू इन अत्यन्त दुर्बल, पतित और शक्तिहीन पाण्डवोंको छोड़ क्यों नहीं देती?' ॥
योऽसौ कर्णः प्रत्यजानात्त्वदर्थे नाहं हत्वा सह कृष्णेन पार्थम् । इहोपयातेति स पापबुद्धिः कच्चिच्छेते शरसम्भिन्नगात्रः ॥ ३९ ॥ 'जिस कर्णने तुम्हारे लिये यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आज मैं श्रीकृष्णसहित अर्जुनको मारे बिना यहाँ नहीं लौटूँगा' क्या वह पापात्मा तुम्हारे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़ा है? ॥ ३९ ॥
कच्चित् संग्रामो विदितो वै तवायं समागमे सृञ्जयकौरवाणाम् । यत्रावस्थामीदृशीं प्रापितोऽहं कच्चित् त्वया सोऽद्य हतो दुरात्मा ॥ ४० ॥ क्या तुम्हें आजके संघर्षमें सृञ्जयों और कौरवोंका जो यह संग्राम हुआ था, उसका समाचार ज्ञात हुआ है, जिसमें मैं ऐसी दुर्दशाको पहुँचा दिया गया। क्या तुमने आज उस