भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2117

जिस दुरात्मा सूतपुत्र कर्णने हँसते-हँसते पहले दुःशासनसे यह बात कही थी कि 'सुबलपुत्रके द्वारा जीती हुई द्रुपदकुमारीको तुम स्वयं जाकर बलपूर्वक यहाँ ले आओ, क्या तुमने आज उसे मार डाला? ॥ ४५ ॥

यः शस्त्रभृच्छ्रेष्ठतमः पृथिव्यां पितामहं व्याक्षिपदल्पचेताः । संख्यायमानोऽर्धरथः स कच्चित् त्वया हतोऽद्याधिरथिर्महात्मन् ॥ ४६ ॥

महात्मन्! जो पृथ्वीपर समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठतम समझा जाता था तथा जिस मूर्खने अर्धरथी गिना जानेपर पितामह भीष्मके ऊपर महान् आक्षेप किया था, उस अधिरथपुत्रको क्या तुमने आज मार डाला? ॥ ४६ ॥

अमर्षजं निकृतिसमीरणेरितं हृदि स्थितं ज्वलनमिमं सदा मम । हतो मया सोऽद्य समेत्य कर्ण इति ब्रुवन् प्रशमयसेऽद्य फाल्गुन ॥ ४७ ॥

फाल्गुन! मेरे हृदयमें जिस कर्णकी शठतारूपी वायुसे प्रेरित हो अमर्षकी आग सदा प्रज्वलित रहती है 'उस कर्णको आज युद्धमें पाकर मैंने मार डाला' ऐसा कहते हुए क्या तुम आज मेरी उस अताको बुझा दोगे? ।।

ब्रवीहि मे दुर्लभमेतदद्य कथं त्वया निहतः सूतपुत्रः । अनुध्याये त्वां सततं प्रवीर वृत्रे हतेऽसौ भगवानिवेन्द्रः ॥ ४८ ॥

बोलो, मेरे लिये यह समाचार अत्यन्त दुर्लभ है। वीरवर! तुमने सूतपुत्रको कैसे मारा? मैं वृत्रासुरके मारे जानेपर भगवान् इन्द्रके समान सदा तुम्हारे विजयी स्वरूपका चिन्तन करता हूँ ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥