भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2121

स्तदा कर्णः प्राहिणोन्मृत्युसङ्ग ॥ १४ ॥

राजन्! मृत्युके फैले हुए मुँहके समान कर्णके पास पहुँचकर प्रभद्रकगण भारी संकटमें

पड़ गये। कर्णने युद्धके समुद्रमें डूबे हुए उन सात सौ रथियोंको तत्काल मृत्युके लोकमें भेज

दिया था ॥ १४ ॥

न चाप्यभूत् क्लान्तमनाः स राजन्

यावन्नास्मान् दृष्टवान् सूतपुत्रः ।

श्रुत्वा तु त्वां तेन दृष्टं समेत-

मश्वत्थाम्ना पूर्वतरं क्षतं च ॥ १५ ॥

मन्ये कालमपयानस्य राजन्

क्रूरात् कर्णात् तेऽहमचिन्त्यकर्मन् ।

अचिन्त्यकर्मा नरेश्वर! जबतक सूतपुत्रने हमलोगोंको नहीं देखा था, तबतक उसके

मनमें उद्वेग या खेद नहीं हुआ था। मैंने जब सुना कि उसने पहले आपपर दृष्टिपात किया

था और आपसे उसका युद्ध भी हुआ था, साथ ही उससे भी पहले अश्वत्थामाने आपको

क्षत-विक्षत कर दिया था, तब क्रूरकर्मा कर्णके सामनेसे आपका यहाँ चला आना ही मुझे

समयोचित प्रतीत हुआ ॥

मया कर्णस्यास्त्रमिदं पुरस्ताद्

युद्धे दृष्टं पाण्डव चित्ररूपम् ॥ १६ ॥

न ह्यन्योद्धा विद्यते सृञ्जयानां

महारथं योऽद्य सहेत कर्णम् ।

पाण्डुनन्दन! मैंने युद्धमें अपने सामने कर्णके इस विचित्र अस्त्रको देखा था। सृंजयोंमें

दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो आज महारथी कर्णका सामना कर सके ॥

शैनेयो मे सात्यकिश्चक्ररक्षौ

धृष्टद्युम्नश्चापि तथैव राजन् ॥ १७ ॥

युधामन्युश्चोत्तमौजाश्च शूरौ

पृष्ठतो मां रक्षतां राजपुत्रौ ।

राजन्! शिनिपौत्र सात्यकि और धृष्टद्युम्न मेरे चक्ररक्षक हों; युधामन्यु और उत्तमौजा

—ये दोनों शूरवीर राजकुमार मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ १७१/२ ॥

रथप्रवीरेण महानुभाव

द्विषत्सैन्ये वर्तता दुस्तरेण ॥ १८ ॥

समेत्याहं सपुत्रेण संख्ये

वृत्रेण वज्रीव नरेन्द्रमुख्य ।

योत्स्याम्यहं भारत सूतपुत्र-

मस्मिन् संग्रामे यदि वै दृश्यतेऽद्य ॥ १९ ॥