भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2126

स्वेषां जयाय द्विषतां वधाय ख्यातोऽमितौजाः कुलतन्तुकर्ता ॥ १४ ॥ ‘कुन्ति! तुम्हारा यह महामनापुत्र अदितिके गर्भसे प्रकट हुए शत्रुहन्ता भगवान् विष्णुके समान उत्पन्न हुआ है। यह अमितबलशाली बालक स्वजनोंकी विजय और शत्रुओंके वधके लिये प्रसिद्ध एवं अपनी कुलपरम्पराका प्रवर्तक होगा ॥ १४ ॥’

इत्यन्तरिक्षे शतशृङ्गमूर्ध्नि तपस्विनां शृण्वतां वागुवाच । एवंविधं तच्च नाभूत् तथा च देवापि नूनमनृतं वदन्ति ॥ १५ ॥ ‘शतशृंग पर्वतके शिखरपर तपस्वी महात्माओंके सुनते हुए आकाशवाणीने ये बातें कही थीं; परंतु उसका यह कथन सफल नहीं हुआ। निश्चय ही देवतालोग भी झूठ बोलते हैं ॥ १५ ॥’

तथा परेषामृषिसत्तमानां श्रुत्वा गिरः पूजयतां सदा त्वाम् । न संनतिं प्रैमि सुयोधनस्य न त्वां जानाम्याधिरथेर्भयार्तम् ॥ १६ ॥ ‘इसी प्रकार दूसरे महर्षि भी सदा तुम्हारी प्रशंसा करते हुए ऐसी ही बातें कहा करते थे। उनकी बातें सुनकर ही मैं दुर्योधनके सामने कभी नतमस्तक न हो सका; परंतु मैं यह नहीं जानता था कि तुम अधिरथपुत्र कर्णके भयसे पीड़ित हो जाओगे ॥ १६ ॥’

पूर्वं यदुक्तं हि सुयोधनेन न फाल्गुनः प्रमुखे स्थास्यतीति । कर्णस्य युद्धे हि महाबलस्य मौर्ख्यात् तु तन्नावबुद्धं मयाऽऽसीत् ॥ १७ ॥ ‘दुर्योधनने पहले ही जो यह बात कह दी थी कि ‘अर्जुन युद्धमें महाबली कर्णके सामने नहीं खड़े हो सकेंगे’ उसके इस कथनपर मैंने मूर्खतावश विश्वास नहीं किया था ॥ १७ ॥’

तेनाद्य तप्स्ये भृशमप्रमेयं यच्छत्रुवर्गे नरकं प्रविष्टः । तदैव वाच्योऽस्मि ननु त्वयाहं न योत्स्येऽहं सूतपुत्रं कथंचित् ॥ १८ ॥ ततो नाहं सृञ्जयान् केकयांश्च समानयेयं सुहृदो रणाय ।