भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2128

कौरवोंके साथ युद्ध करते थे। धृतराष्ट्रके पुत्रोंके साथ युद्ध करते हुए भीमसेनका वह महान् सिंहनाद बारंबार सुनायी दे रहा है।

यदि स्म जीवेत् स भवेन्निहन्ता महारथानां प्रवरो रथोत्तमः । तवाभिमन्युस्तनयोऽद्य पार्थ न चास्मि गन्ता समरे पराभवम् ॥ २१ ॥ अथापि जीवेत् समरे घटोत्कच- स्तथापि नाहं समरे पराङ्मुखः ।

'पार्थ! यदि महारथियोंमें श्रेष्ठ और उत्तम रथी तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु जीवित होता तो वह शत्रुओंका वध अवश्य करता। फिर तो समरभूमिमें मुझे ऐसा अपमान नहीं उठाना पड़ता। यदि समरांगणमें घटोत्कच भी जीवित होता तो भी मुझे वहाँसे मुँह फेरकर भागना नहीं पड़ता ॥ २११/२ ॥

(भीमस्य पुत्रः समराग्रयायी महास्त्रविच्चापि तवानुरूपः । यत्नं समासाद्य रिपोर्बलं नो निमीलिताक्षं भयविप्लुतं भवेत् ॥

'भीमसेनका वह पुत्र समरभूमिमें आगे चलनेवाला, महान् अस्त्रवेत्ता और तुम्हारे समान ही पराक्रमी था। उसके होनेपर हमारे शत्रुओंकी सेना यत्न करके भी सफल न होती और भयसे व्याकुल होकर आँखें बंद कर लेती।

चकार योऽसौ निशि युद्धमेक- स्त्यक्त्वा रणं यस्य भयाद् द्रवन्ते । स चेत् समासाद्य महानुभावः कर्णं रणे बाणगणैः प्रमोह्य । धैर्ये स्थितेनापि च सूतजेन शक्त्या हतो वासवदत्तया तया ॥)

'उस महानुभाव वीरने अकेले ही रात्रिमें युद्ध किया था, जिससे शत्रुसैनिक भयके मारे रणभूमि छोड़कर भागने लगे थे। उसने कर्णपर आक्रमण करके रणभूमिमें अपने बाणसमूहोंद्वारा सबको मोहमें डाल दिया था; परंतु धैर्यमें स्थित हुए सूतपुत्र कर्णने इन्द्रकी दी हुई उस शक्तिके द्वारा उसे मार डाला।

मम ह्यभाग्यानि पुरा कृतानि पापानि नूनं बलवन्ति युद्धे ॥ २२ ॥ तृणं च कृत्वा समरे भवन्तं ततोऽहमेवं निकृतो दुरात्मना ।