भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2130

प्रयच्छान्यस्मै गाण्डीवमेतदद्य त्वत्तो योऽस्त्रैरभ्यधिको वा नरेन्द्रः । ‘यदि तुम आज रणभूमिमें विचरते हुए इस भयानक वीर राधापुत्र कर्णका सामना करनेकी शक्ति नहीं रखते तो अब यह गाण्डीव धनुष दूसरे किसी ऐसे राजाको दे दो जो अस्त्रबलमें तुमसे बढ़कर हो ।। २७ १/२ ।।'

अस्मान् नैवं पुत्रदारैर्विहीनान् सुखाद् भ्रष्टान् राज्यनाशाच्च भूयः ।। २८ ।। द्रष्टा लोकः पतितानप्यगाधे पापैर्जुष्टे नरके पाण्डवेय । ‘पाण्डुनन्दन! ऐसा हो जानेपर संसारके मनुष्य हमें फिर इस प्रकार स्त्री-पुत्रोंके संयोगसे रहित, राज्य नष्ट होनेके कारण सुखसे वंचित तथा पापियोंद्वारा सेवित अगाध नरकतुल्य कष्टमें गिरा हुआ नहीं देखेंगे ।। २८ १/२ ।।'

मासेऽपतिष्यः पञ्चमे त्वं सुकृच्छ्रे न वा गर्भे आभविष्यः पृथायाः ।। २९ ।। तत् ते श्रेयो राजपुत्राभविष्य- न्न चेत् संग्रामादपयानं दुरात्मन् । ‘दुरात्मा राजपुत्र! यदि तुम पाँचवें महीनेमें माताके गर्भसे गिर गये होते अथवा माता कुन्तीके अत्यन्त कष्टदायक गर्भमें आये ही नहीं होते तो वह तुम्हारे लिये अच्छा होता; क्योंकि उस दशामें तुम्हें युद्धसे भाग आनेका कलंक तो नहीं प्राप्त होता ।। २९ १/२ ।।'

धिग्गाण्डीवं धिक् च ते बाहुवीर्य- मसंख्येयान् बाणगणांश्च धिक् ते । धिक् ते केतुं केसरिणः सुतस्य कृशानुदत्तं च रथं च धिक् ते ।। ३० ।। ‘धिक्कार है तुम्हारे इस गाण्डीव धनुषको, धिक्कार है तुम्हारी भुजाओंके पराक्रमको, धिक्कार है तुम्हारे इन असंख्य बाणोंको, धिक्कार है हनुमान्‌जीके द्वारा उपलक्षित तुम्हारी इस ध्वजाको तथा धिक्कार है अग्निदेवके दिये हुए इस रथको’ ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरक्रोधवाक्येऽष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका क्रोधपूर्ण वचनविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं।)