महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2175, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक एव रणे भीष्म एकवीरत्वमागतः । ‘किंतु समरांगणमें भीष्मजी अकेले ही पाण्डवों और सृंजयोंको खदेड़कर युद्धमें अद्वितीय वीरके रूपमें विख्यात हुए ।। ३९ १/२ ।। तं शिखण्डी समासाद्य त्वया गुप्तो महाव्रतम् ।। ४० ।। जघान पुरुषव्याघ्रं शरैः संनतपर्वभिः । स एष पतितः शेते शरतल्पे पितामहः ।। ४१ ।। त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्रं वृत्रः प्राप्येव वासवम् । ‘अर्जुन! तुमसे सुरक्षित हुए शिखण्डीने महान् व्रतधारी पुरुषसिंह भीष्मजीपर चढ़ाई करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उन्हें मार गिराया, वे ही ये पितामह भीष्म तुम-जैसे पुरुषसिंहको विपक्षमें पाकर धराशायी हो शरशय्यापर सो रहे हैं। ठीक उसी तरह, जैसे वृत्रासुर इन्द्रसे टक्कर लेकर रणशय्यापर सो गया था ।। ४०-४१ १/२ ।। द्रोणः पञ्चदिनान्युग्रो विधम्य रिपुवाहिनीम् ।। ४२ ।। कृत्वा व्यूहमभेद्यं च पातयित्वा महारथान् । जयद्रथस्य समरे कृत्वा रक्षां महारथः ।। ४३ ।। अन्तकप्रतिमश्चोग्रो रात्रियुद्धेऽदहत् प्रजाः । ‘तत्पश्चात् उग्रमूर्ति महारथी द्रोणाचार्य पाँच दिनोंतक अभेद्यव्यूहका निर्माण, शत्रुसेनाका विध्वंस, महारथियोंका विनाश तथा समरांगणमें जयद्रथकी रक्षा करनेके अनन्तर रात्रियुद्धमें यमराजके समान प्रजाको दग्ध करने लगे ।। दग्ध्वा योधान् शरैर्वीरो भारद्वाजः प्रतापवान् ।। ४४ ।। धृष्टद्युम्नं समासाद्य स गतः परमां गतिम् । ‘प्रतापी भरद्वाजनन्दन वीर द्रोणाचार्य अपने बाणोंद्वारा शत्रुयोद्धाओंको दग्ध करके धृष्टद्युम्नसे भिड़कर परमगतिको प्राप्त हो गये ।। ४४ १/२ ।। यदि वाद्य भवान् युद्धे सूतपुत्रमुखान् रथान् ।। ४५ ।। नावारयिष्यः संग्रामे न स्म द्रोणो व्यनङ्क्ष्यत । ‘उस समय यदि तुम युद्धस्थलमें सूतपुत्र आदि रथियोंको न रोकते तो रणभूमिमें द्रोणाचार्यका नाश नहीं होता ।। भवता तु बलं सर्वं धार्तराष्ट्रस्य वारितम् ।। ४६ ।। ततो द्रोणो हतो युद्धे पार्षतेन धनंजय । ‘धनंजय! तुमने दुर्योधनकी सारी सेनाको रोक रखा था; इसीलिये धृष्टद्युम्न संग्राममें द्रोणाचार्यका वध कर सके ।। एवं वा को रणे कुर्यात् त्वदन्यः क्षत्रियो युधि ।। ४७ ।। यादृशं ते कृतं पार्थ जयद्रथवधं प्रति ।