भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2181

'अन्य सब नरेश इन्हींके योग-क्षेममें लगे हुए हैं। भद्रे! देख, इस समय पाण्डव दुर्योधनके तेजसे एक साथ ही नष्टप्राय होकर एक-दूसरेका मुँह देख रहे हैं।। ८७½।। व्यक्तं षण्ढतिला ह्येते निरये च निमज्जिताः ।। ८८ ।। प्रेष्यवच्चापि राजानमुपस्थास्यन्ति कौरवम् । 'निश्चय ही ये थोथे तिलोंके समान नपुंसक हैं और नरकमें डूब गये हैं। आजसे ये दासोंके समान कौरव-नरेशकी सेवामें उपस्थित होंगे' ।। ८८½।। इत्युक्तवानधर्मज्ञस्तदा परमदुर्मतिः ।। ८९ ।। पापः पापवचः कर्णः शृण्वतस्तव भारत । 'भारत! उस समय अधर्मका ही ज्ञान रखनेवाले परम दुर्बुद्धि पापी कर्णने तुम्हारे सुनते हुए ऐसे-ऐसे पापपूर्ण वचन कहे थे ।। ८९½।। अद्य पापस्य तद् वाक्यं सुवर्णविकृताः शराः ।। ९० ।। शमयन्तु शिलाधौतास्त्वयास्ता जीवितच्छिदः । 'आज तुम्हारे छोड़े हुए एवं शिलापर स्वच्छ किये हुए सुवर्णनिर्मित प्राणान्तकारी बाण पापी कर्णके उन वचनोंका उत्तर देते हुए उसे सदाके लिये शान्त कर दें ।। यानि चान्यानि दुष्टात्मा पापानि कृतवांस्त्वयि ।। ९१ ।। तान्यद्य जीवितं चास्य शमयन्तु शरास्तव । 'दुष्टात्मा कर्णने तुम्हारे प्रति और भी जो-जो पापपूर्ण बर्ताव किये हैं, उन सबको और इसके जीवनको भी आज तुम्हारे बाण नष्ट कर दें ।। ९१½।। गाण्डीवप्रहितान् घोरानद्य गात्रैः स्पृशन् शरान् ।। ९२ ।। कर्णः स्मरतु दुष्टात्मा वचनं द्रोणभीष्मयोः । 'आज दुष्टात्मा कर्ण अपने अंगोंपर गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए भयंकर बाणोंकी चोट सहता हुआ द्रोणाचार्य और भीष्मके वचनोंको याद करे ।। ९२½।। सुवर्णपुङ्खा नाराचाः शत्रुघ्ना वैद्युतप्रभाः ।। ९३ ।। त्वयास्तास्तस्य वर्माणि भित्त्वा पास्यन्ति शोणितम् । 'बिजलीकी-सी प्रभा और सोनेके पंख धारण करनेवाले तुम्हारे चलाये हुए शत्रुनाशक नाराच कवच छेदकर कर्णका रक्त पान करेंगे ।। ९३½।। उग्रास्त्वद्भुजनिर्मुक्ता मर्म भित्त्वा महाशराः ।। ९४ ।। अद्य कर्णं महावेगाः प्रेषयन्तु यमक्षयम् । 'आज तुम्हारे हाथोंसे छूटे हुए महान् वेगशाली, भयंकर एवं विशाल बाण कर्णका मर्मस्थल विदीर्ण करके उसे यमलोक भेज दें ।। ९४½।। अद्य हाहाकृता दीना विषण्णास्त्वच्छरार्दिताः ।। ९५ ।। प्रपतन्तं रथात् कर्णं पश्यन्तु वसुधाधिपाः ।