भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2189, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2189

दिखायेंगे और क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पोंके समान उसके रक्तका पान करेंगे ।। २२-२३ ।। मया हस्तवता मुक्ता नाराचा वैद्युतत्विषः । गाण्डीवसृष्टा दास्यन्ति कर्णस्य परमां गतिम् ॥ २४ ॥ ‘मैं बाण चलानेमें सिद्धहस्त हूँ। मेरे द्वारा गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बिजलीके समान चमकते हुए नाराच कर्णको परम गति प्रदान करेंगे ।। २४ ।। अद्य तप्स्यति राधेयः पाञ्चालीं यत्तदाब्रवीत् । सभामध्ये वचः क्रूरं कुत्सयन् पाण्डवान् प्रति ॥ २५ ॥ ‘राधापुत्र कर्णने भरी सभामें पाण्डवोंकी निन्दा करते हुए द्रौपदीसे जो क्रूरतापूर्ण वचन कहा था, उसके लिये उसे बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। २५ ।। ये वै षण्ढतिलास्तत्र भवितारोऽद्य ते तिलाः । हते वैकर्तने कर्णे सूतपुत्रे दुरात्मनि ॥ २६ ॥ ‘जो पाण्डव वहाँ थोथे तिलोंके समान नपुंसक कहे गये थे, वे दुरात्मा सूतपुत्र वैकर्तन कर्णके मारे जानेपर आज अच्छे तिल और शूरवीर सिद्ध होंगे ।। २६ ।। अहं वः पाण्डुपुत्रेभ्यस्त्रास्यामीति यदब्रवीत् । धृतराष्ट्रसुतान् कर्णः श्लाघमानोऽत्मनो गुणान् ॥ २७ ॥ अनृतं तत् करिष्यन्ति मामका निशिताः शराः । उद्योगः पाण्डुपुत्राणां समाप्तिमुपयास्यति ॥ २८ ॥ ‘अपने गुणोंकी प्रशंसा करते हुए सूतपुत्र कर्णने धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे जो यह कहा था कि ‘मैं पाण्डवोंसे तुम्हारी रक्षा करूँगा’ उसके इस कथनको मेरे तीखे बाण असत्य कर देंगे और पाण्डवोंका युद्धविषयक उद्योग समाप्त हो जायगा ।। २७-२८ ।। हन्ताहं पाण्डवान् सर्वान् सपुत्रानिति योऽब्रवीत् । तमद्य कर्णं हन्तास्मि मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ २९ ॥ ‘जिसने यह कहा था कि मैं ‘पुत्रोंसहित समस्त पाण्डवोंको मार डालूँगा’ उस कर्णको आज समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं नष्ट कर दूँगा ।। २९ ।। यस्य वीर्यं समाश्रित्य धार्तराष्ट्रो महामनाः । अवामन्यत दुर्बुद्धिर्नित्यमस्मान् दुरात्मवान् ॥ ३० ॥ हत्वाहं कर्णमाजौ हि तोषयिष्यामि भ्रातरम् । ‘जिसके बल-पराक्रमका भरोसा करके महामनस्वी दुर्बुद्धि एवं दुरात्मा दुर्योधन सदा हमलोगोंका अपमान करता आया है, उस कर्णका आज युद्धस्थलमें वध करके मैं अपने भाई युधिष्ठिरको संतुष्ट करूँगा ।। ३० १/२ ।। शरान् नानाविधान् मुक्त्वा त्रासयिष्यामि शात्रवान् । आकर्णमुक्तैरिषुभिर्यमराष्ट्रविवर्धनैः ॥ ३१ ॥