भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2196

समागतं सृंजयश्चोत्तमौजाः । गान्धारराजं सहदेवः क्षुधार्तो महर्षभं सिंह इवाभ्यधावत् ॥ ९ ॥ सृंजयवंशी रथी उत्तमौजाने अपने सामने आये हुए कर्णपुत्र सुषेणपर आक्रमण किया था। जैसे भूखसे पीड़ित हुआ सिंह किसी साँड़पर धावा करता है, उसी प्रकार सहदेव गान्धारराज शकुनिपर टूट पड़े थे ॥ ९ ॥

शतानीको नाकुलिः कर्णपुत्रं युवा युवानं वृषसेनं शरौघैः । समार्पयत् कर्णपुत्रश्च शूरः पाञ्चालेयं शरवर्षैरनेकैः ॥ १० ॥ नकुलपुत्र नवयुवक शतानीकने कर्णके नौजवान बेटे वृषसेनको अपने बाणसमूहोंसे घायल कर दिया तथा शूरवीर कर्णपुत्र वृषसेनने भी अनेक बाणोंकी वर्षा करके पांचालीकुमार शतानीकको गहरी चोट पहुँचायी ॥

रथर्षभः कृतवर्माणमार्ज- न्माद्रीपुत्रो नकुलश्चित्रयोधी । पञ्चालानामधिपो याज्ञसेनिः सेनापतिः कर्णमार्छत् ससैन्यम् ॥ ११ ॥ विचित्र युद्ध करनेवाले, रथियोंमें श्रेष्ठ माद्रीकुमार नकुलने कृतवर्मापर चढ़ाई की। द्रुपदकुमार पांचालराज सेनापति धृष्टद्युम्नने सेनासहित कर्णपर आक्रमण किया ॥

दुःशासनो भारत भारतीं च संशप्तकानां पृतना समृद्धा । भीमं रणे शस्त्रभृतां वरिष्ठं भीमं समार्छत्तमसह्यवेगम् ॥ १२ ॥ भारत! दुःशासन, कौरव-सेना और संशप्तकोंकी समृद्धिशालिनी वाहिनीने असह्य वेगशाली, शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें भयंकर प्रतीत होनेवाले भीमसेनपर चढ़ाई की ॥ १२ ॥

कर्णात्मजं तत्र जघान वीर- स्तथाच्छिनच्चोत्तमौजाः प्रसह्य । तस्योत्तमाङ्गं निपपात भूमौ निनादयद् गां निनदेन खं च ॥ १३ ॥ वीर उत्तमौजाने हठपूर्वक वहाँ कर्णपुत्र सुषेणपर घातक प्रहार किया और उसका मस्तक काट डाला। सुषेणका वह मस्तक अपने आर्तनादसे आकाश और पृथिवीको प्रतिध्वनित करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥