महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2206, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौन्तेय पश्योरसि कौस्तुभं च जाज्वल्यमानं विजयां स्रजं च ॥ ३५ ॥ कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णके इस बहुमूल्य पांचजन्य शंखको जो चन्द्रमाके समान श्वेतवर्ण है, देखिये। साथ ही उनके वक्षःस्थलपर अपनी प्रभासे प्रज्वलित होनेवाली कौस्तुभमणि तथा वैजयन्ती मालापर भी दृष्टिपात कीजिये ॥ ३५ ॥
ध्रुवं रथाग्रयः समुपैति पार्थो विद्रावयन् सैन्यमिदं परेषाम् । सिताभ्रवर्णैरसितप्रयुक्तै- र्हयैर्महार्है रथिनां वरिष्ठः ॥ ३६ ॥ निश्चय ही रथियोंमें श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन अर्जुन शत्रुओंकी सेनाको खदेड़ते हुए इधर ही आ रहे हैं। सफेद बादलोंके समान श्वेत कान्तिवाले उनके महामूल्यवान् अश्व श्यामसुन्दर श्रीकृष्णद्वारा संचालित हो रहे हैं ॥ ३६ ॥
रथान् हयान् पत्तिगणांश्च सायकै- र्विदारितान् पश्य पतन्त्यमी यथा । तवानुजेनामरराजतेजसा महावनानीव सुपर्णवायुना ॥ ३७ ॥ देखिये, जैसे गरुड़के पंखसे उठी हुई वायुके द्वारा बड़े-बड़े जंगल धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी आपके छोटे भाई अर्जुन बाणोंद्वारा शत्रुओंके रथों, घोड़ों और पैदलसमूहोंको विदीर्ण कर रहे हैं और वे सब-के-सब पृथ्वीपर गिरते जा रहे हैं ॥ ३७ ॥
चतुःशतान् पश्य रथानिमान् हतान् सवाजिसूतान् समरे किरीटिना । महेषुभिः सप्तशतानि दन्तिनां पदातिसादींश्च रथाननेककः ॥ ३८ ॥ वह देखिये, किरीटधारी अर्जुनने समरांगणमें सारथि और घोड़ोंसहित इन चार सौ रथियोंको मार डाला तथा अपने विशाल बाणोंद्वारा सात सौ हाथियों, बहुत-से पैदलों, घुड़सवारों और अनेकानेक रथोंका संहार कर डाला ॥
अयं समभ्येति तवान्तिकं बली निघ्नन् कुरूंश्चित्र इव ग्रहोऽर्जुनः । समृद्धकामोऽसि हतास्तवाहिता बलं तवायुश्च चिराय वर्धताम् ॥ ३९ ॥ विचित्र ग्रहके समान ये बलवान् अर्जुन कौरवोंका संहार करते हुए आपके निकट आ रहे हैं। अब आपकी कामना सफल हुई। आपके शत्रु मारे गये। इस समय चिरकालके लिये