महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सूतं चैव विशाम्पते । ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्वरमाणः पराक्रमी ।। ६६ ।। प्रजानाथ! पराक्रमी भीमसेनने फुर्ती दिखाते हुए शकुनिके चारों घोड़ों और सारथिको मारकर एक भल्लके द्वारा उसके ध्वजको भी काट दिया ।। ६६ ।।
हताश्वं रथमुत्सृज्य त्वरमाणो नरोत्तमः । तस्थौ विस्फारयंश्चापं क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् ।। ६७ ।। उस समय नरश्रेष्ठ शकुनि उस अश्वहीन रथको छोड़कर क्रोधसे लाल आँखें किये लंबी साँस खींचता और धनुषकी टंकार करता हुआ तुरंत भूमिपर खड़ा हो गया ।। ६७ ।।
शरैश्च बहुधा राजन् भीममार्च्छत् समन्ततः । प्रतिहत्य तु वेगेन भीमसेनः प्रतापवान् ।। ६८ ।। धनुश्चिच्छेद संक्रुद्धो विव्याध च शितैः शरैः । राजन्! उसने अपने बाणोंद्वारा भीमसेनपर सब ओरसे बारंबार प्रहार किया, किंतु प्रतापी भीमसेनने बड़े वेगसे उसके बाणोंको नष्ट करके अत्यन्त कुपित हो उसका धनुष काट डाला और पैने बाणोंसे उसे घायल कर दिया ।। ६८ १/२ ।।
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुकर्शनः ।। ६९ ।। निपपात तदा भूमौ किंचित्प्राणो नराधिपः । बलवान् शत्रुके द्वारा अत्यन्त घायल किया हुआ शत्रुसूदन राजा शकुनि तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसमें जीवनका कुछ-कुछ लक्षण शेष था ।। ६९ १/२ ।।
ततस्तं विह्वलं ज्ञात्वा पुत्रस्तव विशाम्पते ।। ७० ।। अपोवाह रथेनाजौ भीमसेनस्य पश्यतः । प्रजानाथ! उसे विह्वल जानकर आपका पुत्र दुर्योधन रणभूमिमें रथके द्वारा भीमसेनके देखते-देखते अन्यत्र हटा ले गया ।। ७० १/२ ।।
रथस्थे तु नरव्याघ्रे धार्तराष्ट्राः पराङ्मुखाः ।। ७१ ।। प्रदुद्रुवुर्दिशो भीता भीमाज्जाते महाभये । पुरुषसिंह भीमसेन रथपर ही बैठे रहे। उनसे महान् भय प्राप्त होनेके कारण धृतराष्ट्रके सभी पुत्र युद्धसे मुँह मोड़, डरकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। ७१ १/२ ।।
सौबले निर्जिते राजन् भीमसेनेन धन्विना ।। ७२ ।। भयेन महताऽऽविष्टः पुत्रो दुर्योधनस्तव । अपायाज्जवनैरश्वैः सापेक्षो मातुलं प्रति ।। ७३ ।। राजन्! धनुर्धर भीमसेनके द्वारा शकुनिके परास्त हो जानेपर आपके पुत्र दुर्योधनको बड़ा भय हुआ। वह मामाके जीवनकी रक्षा चाहता हुआ वेगशाली घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग निकला ।। ७२-७३ ।।
पराङ्मुखं तु राजानं दृष्ट्वा सैन्यानि भारत ।