महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2235, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें**कर्णने कहा—**शल्य! इस समय तुम अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो और मुझसे सहमत जान पड़ते हो। महाबाहो! तुम अर्जुनसे डरो मत ॥ ४९ ॥ पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य शिक्षितस्य च पश्य मे । एकोऽद्य निहनिष्यामि पाण्डवानां महाचमूम् ॥ ५० ॥ आज मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखो और मेरी शिक्षाकी शक्तिपर भी दृष्टिपात करो। आज मैं अकेला ही पाण्डवोंकी विशाल सेनाका संहार कर डालूँगा ॥ ५० ॥ कृष्णौ च पुरुषव्याघ्र ततः सत्यं ब्रवीमि ते । नाहत्वा युधि तौ वीरौ व्यपयास्ये कथंचन ॥ ५१ ॥ पुरुषसिंह! मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि युद्धस्थलमें उन दोनों वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध किये बिना मैं किसी तरह पीछे नहीं हटूँगा ॥ ५१ ॥ स्वप्स्ये वा निहतस्ताभ्यामनित्यो हि रणे जयः । कृतार्थोऽद्य भविष्यामि हत्वा वाप्यथवा हतः ॥ ५२ ॥ अथवा उन्हीं दोनोंके हाथों मारा जाकर सदाके लिये सो जाऊँगा, क्योंकि रणमें विजय अनिश्चित होती है। आज मैं उन दोनोंको मारकर अथवा मारा जाकर सर्वथा कृतार्थ हो जाऊँगा ॥ ५२ ॥
शल्य उवाच
अजय्यमेनं प्रवदन्ति युद्धे महारथाः कर्ण रथप्रवीरम् । एकाकिनं किमु कृष्णाभिगुप्तं विजेतुमेनं क इहोत्सहेत ॥ ५३ ॥ **शल्यने कहा—**कर्ण! रथियोंमें प्रमुख वीर अर्जुन अकेले भी हों तो महारथी योद्धा उन्हें युद्धमें अजेय बताते हैं, फिर इस समय तो वे श्रीकृष्णसे सुरक्षित हैं; ऐसी दशामें कौन इन्हें जीतनेका साहस कर सकता है? ॥ ५३ ॥
कर्ण उवाच
नैतादृशो जातु बभूव लोके रथोत्तमो यावदुपश्रुतं नः । तमीदृशं प्रतियोत्स्यामि पार्थं महाहवे पश्य च पौरुषं मे ॥ ५४ ॥ **कर्ण बोला—**शल्य! मैंने जहाँतक सुना है, वहाँतक संसारमें ऐसा श्रेष्ठ महारथी वीर कभी नहीं उत्पन्न हुआ, ऐसे कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ मैं महासमरमें युद्ध करूँगा, मेरा पुरुषार्थ देखो ॥ ५४ ॥ रणे चरत्येष रथप्रवीरः