महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2242, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहयांश्चतुर्भिंश्च पुनस्त्रिभिर्ध्वजं धनंजयो द्रौणिरथादपातयत् ॥ ८३ ॥ तब अर्जुनने तीन बाणोंसे चमकते हुए उसके धनुषको, एक क्षुरके द्वारा सारथिके मस्तकको, चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको तथा तीनसे उसके ध्वजको भी अश्वत्थामाके रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ८३ ॥
स रोषपूर्णो मणिवज्रहाटकै- रलङ्कृतं तक्षकभोगवर्चसम् । महाधनं कार्मुकमन्यदाददे यथा महाहिप्रवरं गिरेस्तटात् ॥ ८४ ॥ फिर अश्वत्थामाने रोषमें भरकर मणि, हीरा और सुवर्णसे अलंकृत तथा तक्षकके शरीरकी भाँति अरुण कान्तिवाले दूसरे बहुमूल्य धनुषको हाथमें लिया, मानो पर्वतके किनारेसे विशाल अजगरको उठा लिया हो ॥ ८४ ॥
स्वमायुधं चोपनिकीर्य भूतले धनुश्च कृत्वा सगुणं गुणाधिकः । समार्दयत्तावजितौ नरोत्तमौ शरोत्तमैर्द्रौणिरविध्यदन्तिकात् ॥ ८५ ॥ अपने टूटे हुए धनुषको पृथ्वीपर फेंककर अधिक गुणशाली अश्वत्थामाने उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी और किसीसे पराजित न होनेवाले उन दोनों नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुनको उत्तम बाणोंद्वारा निकटसे पीड़ित एवं घायल करना आरम्भ किया ॥ ८५ ॥
कृपश्च भोजश्च तवात्मजश्च ते शरैरनेकैर्युधि पाण्डवर्षभम् । महारथाः संयुगमूर्धनि स्थिता- स्तमोमुदं वारिधरा इवापतन् ॥ ८६ ॥ युद्धके मुहानेपर खड़े हुए कृपाचार्य, कृतवर्मा और आपके पुत्र दुर्योधन—ये तीन महारथी युद्धस्थलमें अनेक बाणोंद्वारा पाण्डवप्रवर अर्जुनको चोट पहुँचाने लगे, मानो बहुत-से मेघ सूर्यदेवपर टूट पड़े हों ॥ ८६ ॥
कृपस्य पार्थः सशरं शरासनं हयान् ध्वजान् सारथिमेव पत्रिभिः । समर्पयद् बाहुसहस्रविक्रम- स्तथा यथा वज्रधरः पुरा बलेः ॥ ८७ ॥ सहस्र भुजाओंवाले कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा कृपाचार्यके बाणसहित धनुष, घोड़े, ध्वज और सारथिको भी उसी प्रकार बींध