महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2244, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर श्रीकृष्णने व्याकुल हुए समस्त शत्रुओंको अपने रथके द्वारा शीघ्र ही दाहिने
कर दिया। फिर वृत्रासुरको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़नेवाले इन्द्रके समान वेगपूर्वक आगे
जाते हुए धनंजयपर दूसरे योद्धाओंने ऊँचे किये ध्वजवाले सुसज्जित रथोंद्वारा पुनः धावा
किया ।। ९१ १/२ ।।
अथाभिसृत्य प्रतिवार्य तानरीन्
धनंजयस्याभिमुखं महारथाः ।। ९२ ।।
शिखण्डिशैनेययमाः शितैः शरै-
र्विदारयन्तो व्यनदन् सुभैरवम् ।
अर्जुनके सम्मुख जाते हुए उन शत्रुओंके सामने पहुँचकर महारथी शिखण्डी, सात्यकि,
नकुल और सहदेवने उन्हें रोका और पैने बाणोंद्वारा उन सबको विदीर्ण करते हुए भयंकर
गर्जना की ।। ९२ १/२ ।।
ततोऽभिजघ्नुः कुपिताः परस्परं
शरैस्तदाऽऽजोगतिभिः सुतेजनैः ।। ९३ ।।
कुरुप्रवीराः सह सृञ्जयैरथा-
सुराः पुरा देवगणैस्तथाऽऽहवे ।
तत्पश्चात् सृञ्जयोंके साथ भिड़े हुए कौरव वीर कुपित हो शीघ्रगामी और तेज बाणोंद्वारा
एक-दूसरेपर उसी प्रकार चोट करने लगे, जैसे पूर्वकालमें देवताओंके साथ युद्ध करनेवाले
असुरोंने संग्राममें परस्पर प्रहार किया था ।। ९३ १/२ ।।
जयेप्सवः स्वर्गमनाय चोत्सुकाः
पतन्ति नागाश्वरथाः परंतप ।। ९४ ।।
जगर्जुरुच्चैर्बलवच्च विव्यधुः
शरैः सुमुक्तैरितरेतरं पृथक् ।
शत्रुओंको तपानेवाले नरेश! हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथी योद्धा विजय चाहते हुए
स्वर्गलोकमें जानेके लिये उत्सुक हो शत्रुओंपर टूट पड़ते, उच्च स्वरसे गर्जते और अच्छी
तरह छोड़े हुए बाणोंद्वारा एक-दूसरेको पृथक्-पृथक् गहरी चोट पहुँचाते थे ।। ९४ १/२ ।।
शरान्धकारे तु महात्मभिः कृते
महामृधे योधवरैः परस्परम् ।
चतुर्दिशो वै विदिशश्च पार्थिव
प्रभा च सूर्यस्थ तमोवृताभवत् ।। ९५ ।।
महाराज! उस महासमरमें महामनस्वी श्रेष्ठ योद्धाओंने परस्पर छोड़े हुए बाणोंद्वारा घोर
अन्धकार फैला दिया। चारों दिशाएँ, विदिशाएँ तथा सूर्यकी प्रभा भी उस अन्धकारसे
आच्छादित हो गयीं ।। ९५ ।।