भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2247

जिनपर अर्जुनके बाणोंकी बारंबार मार पड़ी थी, वे रथके घोड़े, रथ और हाथी छिन्न-भिन्न और विध्वस्त हो गये थे; उनका एक-एक अंग अथवा अवयव कटकर अलग हो गया था। इन सबके द्वारा वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ।। ७ ।।
सुदुर्गमा सुविषमा घोरात्यर्थं सुदुर्दशा ।
रणभूमिरभूद् राजन् महावैतरणी यथा ।। ८ ।।
राजन्! उस समय रणभूमि महावैतरणी नदीके समान अत्यन्त दुर्गम, बहुत ऊँची-नीची और भयंकर हो गयी थी, उसकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन जान पड़ता था ।।
ईषाचक्राक्षभग्नैश्च व्यश्वैः साश्वैश्च युध्यताम् ।
ससूतैर्हतसूतैश्च रथैस्तीर्णाभवन्मही ।। ९ ।।
योद्धाओंके टूटे-फूटे रथोंसे रणभूमि ढक गयी थी। उन रथोंके ईषादण्ड, पहिये और धुरे खण्डित हो गये थे। कुछ रथोंके घोड़े और सारथि जीवित थे और कुछके अश्व एवं सारथि मार डाले गये थे ।। ९ ।।
सुवर्णवर्णसंनाहैर्योधैः कनकभूषणैः ।
आस्थिताः क्लृप्तवर्माणो भद्रा नित्यमदा द्विपाः ।। १० ।।
क्रुद्धाः क्रूरैर्महामात्रैः पाष्ण्र्यङ्गुष्ठप्रचोदिताः ।
चतुःशताः शरवरैर्हताः पेतुः किरीटिना ।। ११ ।।
पर्यस्तानीव शृङ्गाणि ससत्त्वानि महागिरेः ।
धनंजयशराभ्यस्तैः स्तीर्णा भूर्वरवारणैः ।। १२ ।।
किरीटधारी अर्जुनके उत्तम बाणोंसे आहत होकर नित्य मद बहानेवाले, कवचधारी एवं मंगलमय लक्षणोंसे युक्त चार सौ रोषभरे हाथी धराशायी हो गये। उन हाथियोंपर सुवर्णमय कवच और सोनेके आभूषण धारण करनेवाले योद्धा बैठे थे और क्रूर स्वभाववाले महावत उन्हें अपने पैरोंकी एड़ियों तथा अँगूठोंसे आगे बढ़नेकी प्रेरणा दे रहे थे। उन सबके साथ गिरे हुए वे हाथी जीव-जन्तुओंसहित धराशायी हुए महान् पर्वतके शिखरोंके समान सब ओर पड़े थे। अर्जुनके बाणोंसे विशेष घायल होकर गिरे हुए उन गजराजोंके शरीरोंसे रणभूमि ढक गयी थी ।।
समन्ताज्जलदप्रख्यान् वारणान् मदवर्षिणः ।
अभिपदेऽर्जुनरथो घनान् भिन्दन्त्रिवांशुमान् ।। १३ ।।
जैसे अंशुमाली सूर्य बादलोंको छिन्न-भिन्न करते हुए प्रकाशित हो उठते हैं, उसी प्रकार अर्जुनका रथ सब ओरसे मेघोंकी घटाके समान काले मदस्रावी गजराजोंको विदीर्ण करता हुआ वहाँ आ पहुँचा था ।। १३ ।।
हतैर्गजमनुष्याश्चैर्भिन्नैश्च बहुधा रथैः ।
विशस्त्रयन्त्रकवचैर्युद्धशौण्डैर्गतासुभिः ।। १४ ।।
अपविद्धायुधैर्मार्गः स्तीर्णोऽभूत् फाल्गुनेन वै ।