भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2249

रणभूमिमें उद्विग्न हुई सारी कौरव-सेनाने महाबाहु भीमसेनको छोड़कर युद्धसे मुँह मोड़ लिया॥ २१ १/२॥ ततः कुरुषु भग्नेषु बीभत्सुरपराजितः॥ २२॥ भीमसेनं समासाद्य मुहूर्तं सोऽभ्यवर्तत। इस प्रकार कौरव-सैनिकोंके भाग जानेपर कभी पराजित न होनेवाले अर्जुन भीमसेनके पास पहुँचकर दो घड़ीतक रुके रहे॥ २२ १/२॥ समागम्य च भीमेन मन्त्रयित्वा च फाल्गुनः॥ २३॥ विशल्यमरुजं चास्मै कथयित्वा युधिष्ठिरम्। फिर भीमसे मिलकर उन्होंने कुछ सलाह की और यह बताया कि राजा युधिष्ठिरके शरीरसे बाण निकाल दिये गये हैं, अतः वे इस समय स्वस्थ हैं॥ २३ १/२॥ भीमसेनाभ्यनुज्ञातस्ततः प्रायाद् धनंजयः॥ २४॥ नादयन् रथघोषेण पृथिवीं द्यां च भारत। भारत! तत्पश्चात् भीमसेनकी आज्ञा ले अर्जुन अपने रथकी घर्घराहटसे पृथ्वी और आकाशको गुँजाते हुए वहाँसे चल दिये॥ २४ १/२॥ ततः परिवृतो वीरैर्दशभिर्योधपुङ्गवैः॥ २५॥ दुःशासनावरजैस्तव पुत्रैर्धनंजयः। इसी समय आपके दस वीर पुत्रोंने, जो योद्धाओंमें श्रेष्ठ और दुःशासनसे छोटे थे, अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया॥ २५ १/२॥ ते तमभ्यर्दयन् बाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम्॥ २६॥ आततेष्वसनाः शूरा नृत्यन्त इव भारत। भरतनन्दन! जैसे शिकारी लुआठोंसे हाथीको मारते हैं, उसी प्रकार अपने धनुषको ताने हुए उन शूर-वीरोंने नाचते हुए-से वहाँ अर्जुनको बाणोंद्वारा व्यथित कर डाला॥ अपसव्यांस्तु तांश्चक्रे रथेन मधुसूदनः॥ २७॥ न युक्तान् हि स तान् मेने यमायाशु किरीटिना। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचकर कि अर्जुन-द्वारा इन सबको यमलोकमें भेज देना उचित नहीं है, रथके द्वारा उन्हें शीघ्र ही अपने दाहिने भागमें कर दिया॥ २७ १/२॥ तथान्ये प्राद्रवन् मूढाः पराङ्मुखरथेऽर्जुने॥ २८॥ तेषामापततां केतूनश्वांश्चापानि सायकान्। नाराचैरर्धचन्द्रैश्च क्षिप्रं पार्थो न्यपातयत्॥ २९॥ जब अर्जुनका रथ दूसरी ओर जाने लगा, तब दूसरे मूढ़ कौरव योद्धा लोग उनपर टूट पड़े। उस समय कुन्तीकुमार अर्जुनने उन आक्रमणकारियोंके ध्वज, अश्व, धनुष और बाणोंको नाराचों और अर्धचन्द्रोंद्वारा शीघ्र ही काट गिराया॥ २८-२९॥