महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2271, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाशु भीमं च शरेण भूयो गाढं स विव्याध सुतस्त्वदीयः । चुक्रोध भीमः पुनराशु तस्मै भृशं प्रजज्वाल रुषाभिवीक्ष्य ॥ ५ ॥ उसके इस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर सभी योद्धा बड़े प्रसन्न हुए और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। फिर आपके पुत्रने तुरंत ही एक बाण मारकर भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी। इससे फिर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे उसकी ओर देखकर शीघ्र ही रोषसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४-५ ॥ विद्धोऽस्मि वीराशु भृशं त्वयाद्य सहस्व भूयोऽपि गदाप्रहारम् । उक्त्वैवमुच्चैः कुपितोऽथ भीमो जग्राह तां भीमगदां वधाय ॥ ६ ॥ और बोले—'वीर! तूने तो आज मुझे शीघ्रतापूर्वक बाण मारकर बहुत घायल कर दिया; किंतु अब स्वयं भी मेरी गदाका प्रहार सहन कर।' उच्च स्वरसे ऐसा कहकर कुपित हुए भीमसेनने दुःशासनके वधके लिये एक भयंकर गदा हाथमें ले ली ॥ ६ ॥ उवाच चाद्याहमहं दुरात्मन् पास्यामि ते शोणितमाजिमध्ये । अथैवमुक्तस्तनयस्तवोग्रां शक्तिं वेगात् प्राहिणोन्मृत्युरूपाम् ॥ ७ ॥ फिर वे इस प्रकार बोले—'दुरात्मन्! आज इस संग्राममें मैं तेरा रक्त-पान करूँगा।' भीमके ऐसा कहते ही आपके पुत्रने उनके ऊपर बड़े वेगसे एक भयंकर शक्ति चलायी, जो मृत्युरूप जान पड़ती थी ॥ ७ ॥ आविध्य भीमोऽपि गदां सुघोरां विचिक्षिपे रोषपरीतमूर्तिः । सा तस्य शक्तिं सहसा विरुज्य पुत्रं तवाजौ ताडयामास मूर्ध्नि ॥ ८ ॥ इधरसे रोषमें भरे हुए भीमसेनने भी अपनी अत्यन्त घोर गदा घुमाकर फेंकी। वह गदा रणभूमिमें दुःशासनकी उस शक्तिको टूक-टूक करती हुई सहसा उसके मस्तकमें जा लगी ॥ ८ ॥ स विक्षरन् नाग इव प्रभिन्नो गदामस्मै तुमुले प्राहिणोद् वै । तयाहरद् दश धन्वन्तराणि दुःशासनं भीमसेनः प्रसह्य ॥ ९ ॥