भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2282

दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तमन्तकस्य प्रजास्विव ।
महाराज! जैसे प्रजावर्गपर यमराजका बल काम करता है, उसी प्रकार भीमसेनका वह पराक्रम देखकर कर्णके मनमें महान् भय समा गया ॥ ७ १/२ ॥
तस्य त्वाकारभावज्ञः शल्यः समितिशोभनः ॥ ८ ॥
उवाच वचनं कर्णं प्राप्तकालमरिंदमम् ।
युद्धमें शोभा पानेवाले शल्य कर्णकी आकृति देखकर ही उसके मनका भाव समझ गये; अतः शत्रुदमन कर्णसे यह समयोचित वचन बोले— ॥ ८ १/२ ॥
मा व्यथां कुरु राधेय नैवं त्वय्युपपद्यते ॥ ९ ॥
एते द्रवन्ति राजानो भीमसेनभयार्दिताः ।
दुर्योधनश्च सम्मूढो भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥ १० ॥
‘राधानन्दन! तुम खेद न करो, तुम्हें यह शोभा नहीं देता है। ये राजालोग भीमसेनके भयसे पीड़ित हो भागे जा रहे हैं। अपने भाइयोंकी मृत्युसे दुःखित हो राजा दुर्योधन भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है ॥ ९-१० ॥
दुःशासनस्य रुधिरे पीयमाने महात्मना ।
व्यापन्नचेतसश्चैव शोकोपहतचेतसः ॥ ११ ॥
दुर्योधनमुपासन्ते परिवार्य समन्ततः ।
कृपप्रभृतयश्चैते हतशेषाः सहोदराः ॥ १२ ॥
‘महामना भीमसेन जब दुःशासनका रक्त पी रहे थे, तभीसे ये कृपाचार्य आदि वीर तथा मरनेसे बचे हुए सब भाई कौरव विपन्न और शोकाकुलचित्त होकर दुर्योधनको सब ओरसे घेरकर उसके पास खड़े हैं ॥
पाण्डवा लब्धलक्ष्याश्च धनंजयपुरोगमाः ।
त्वामेवाभिमुखाः शूरा युद्धाय समुपस्थिताः ॥ १३ ॥
‘अर्जुन आदि पाण्डववीर अपना लक्ष्य सिद्ध कर चुके हैं और अब युद्धके लिये तुम्हारे ही सामने उपस्थित हो रहे हैं ॥ १३ ॥
स त्वं पुरुषशार्दूल पौरुषेण समास्थितः ।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य प्रत्युद्याहि धनंजयम् ॥ १४ ॥
‘पुरुषसिंह! ऐसी अवस्थामें तुम पुरुषार्थका भरोसा करके क्षत्रिय-धर्मको सामने रखते हुए अर्जुनपर चढ़ाई करो ॥
भारो हि धार्तराष्ट्रेण त्वयि सर्वः समाहितः ।
तमुद्वह महाबाहो यथाशक्ति यथाबलम् ॥ १५ ॥
‘महाबाहो! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने सारा भार तुम्हींपर रख छोड़ा है। तुम अपने बल और शक्तिके अनुसार उस भारका वहन करो ॥ १५ ॥
जये स्याद् विपुला कीर्तिर्ध्रुवः स्वर्गः पराजये ।