महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2300, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजहि कर्णं महाबाहो नमुचिं वृत्रहा यथा । श्रेयस्तेऽस्तु सदा पार्थ युद्धे जयमवाप्नुहि ॥ १६ ॥ ‘जिनकी मूर्ति बड़ी ही उग्र और भयंकर है, जो महात्मा हैं, जिनके तीन नेत्र और मस्तकपर जटाजूट है, उन सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शंकरको दूसरे लोग देख भी नहीं सकते फिर उनके साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? परंतु तुमने सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण करनेवाले उन्हीं स्थाणुस्वरूप महादेव साक्षात् भगवान् शिवकी युद्धके द्वारा आराधना की है, अन्य देवताओंने भी तुम्हें वरदान दिये है; इसलिये महाबाहु पार्थ! तुम उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शंकरकी कृपासे कर्णको उसी प्रकार मार डालो, जैसे वृत्रविनाशक इन्द्रने नमुचिका वध किया था। कुन्तीनन्दन! तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। तुम युद्धमें विजय प्राप्त करो’ ।। १३—१६ ।।
अर्जुन उवाच
ध्रुव एव जयः कृष्ण मम नास्त्यत्र संशयः । सर्वलोकगुरुर्यस्त्वं तुष्टोऽसि मधुसूदन ॥ १७ ॥ **अर्जुनने कहा—**मधुसूदन श्रीकृष्ण! मेरी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्के गुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं ।। १७ ।।
चोदयाश्वान् हृषीकेश रथं मम महारथ । नाहत्वा समरे कर्णं निवर्तिष्यति फाल्गुनः ॥ १८ ॥ महारथी हृषीकेश! आप मेरे रथ और घोड़ोंको आगे बढ़ाइये। अब अर्जुन समरांगणमें कर्णका वध किये बिना पीछे नहीं लौटेगा ।। १८ ।।
अद्य कर्णं हतं पश्य मच्छेरैः शकलीकृतम् । मां वा द्रक्ष्यसि गोविन्द कर्णेन निहतं शरैः ॥ १९ ॥ गोविन्द! आज आप मेरे बाणोंसे भरकर टुकड़े-टुकड़े हुए कर्णको देखिये। अथवा मुझे ही कर्णके बाणोंसे मरा हुआ देखियेगा ।। १९ ।।
उपस्थितमिदं घोरं युद्धं त्रैलोक्यमोहनम् । यज्जनाः कथयिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ २० ॥ आज तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला यह घोर युद्ध उपस्थित है। जबतक पृथ्वी कायम रहेगी तबतक संसारके लोग इस युद्धकी चर्चा करेंगे ।। २० ।।
एवं ब्रुवंस्तदा पार्थः कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रत्युद्ययौ रथेनाशु गजं प्रतिगजो यथा ॥ २१ ॥ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहते हुए कुन्तीकुमार अर्जुन उस समय रथके द्वारा शीघ्रतापूर्वक कर्णके सामने गये, मानो किसी हाथीका सामना करनेके लिये प्रतिद्वन्द्वी हाथी जा रहा हो ।। २१ ।।