भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2335

और ध्वजोंमें जा लगे ॥ २५ ॥ निर्भिद्य तूर्णं विविशुः सुतीक्ष्णा- स्तार्क्ष्यत्रस्ता भूमिमिवोरगास्ते । शराचिताङ्गो रुधिरार्द्रगात्रः कर्णस्तदा रोषविवृत्तनेत्रः ॥ २६ ॥ जैसे गरुड़से डरे हुए सर्प धरती छेदकर उसके भीतर घुस जाते हैं, उसी प्रकार वे तीखे अस्त्र उपर्युक्त वस्तुओंको विदीर्ण कर शीघ्र ही उनके भीतर धँस गये। कर्णके सारे अंग बाणोंसे भर गये। सम्पूर्ण शरीर रक्तसे नहा उठा। इससे उसके नेत्र उस समय क्रोधसे घूमने लगे ॥

दृढज्यमानाम्य समुद्रघोषं प्रादुश्चक्रे भार्गवास्त्रं महात्मा । महेन्द्रशस्त्राभिमुखान् विमुक्तां- श्छित्त्वा कर्णः पाण्डवस्येषुसंघान् ॥ २७ ॥ तस्यास्त्रमस्त्रेण निहत्य सोऽथ जघान संख्ये रथनागपत्तीन् । अमृष्यमाणश्च महेन्द्रकर्मा महारणे भार्गवास्त्रप्रतापात् ॥ २८ ॥ उस महामनस्वी वीरने अपने धनुषको जिसकी प्रत्यंचा सुदृढ़ थी, झुकाकर समुद्रके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले भार्गवास्त्रको प्रकट किया और अर्जुनके महेन्द्रास्त्रसे प्रकट हुए बाणसमूहोंके टुकड़े-टुकड़े करके अपने अस्त्रसे उनके अस्त्रको दबाकर युद्धस्थलमें रथों, हाथियों और पैदलसैनिकोंका संहार कर डाला। अमर्षशील कर्ण उस महासमरमें भार्गवास्त्रके प्रतापसे देवराज इन्द्रके समान पराक्रम प्रकट कर रहा था ॥ २७-२८ ॥

पञ्चालानां प्रवरांश्चापि योधान् क्रोधाविष्टः सूतपुत्रस्तरस्वी । बाणैर्विव्याधाहवे सुप्रमुक्तैः शिलाशितै रुक्मपुङ्खैः प्रसह्य ॥ २९ ॥ क्रोधमें भरे हुए वेगशाली सूतपुत्र कर्णने अच्छी तरह छोड़े गये और शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें हठपूर्वक मुख्य-मुख्य पांचालयोद्धाओंको घायल कर दिया ॥ २९ ॥

तत्पञ्चालाः सोमकाश्चापि राजन् कर्णेनाजौ पीड्यमानाः शरौघैः । क्रोधाविष्टा विव्यधुस्तं समन्तात् तीक्ष्णैर्बाणैः सूतपुत्रं समेताः ॥ ३० ॥