महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2338, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिलोंके समान नपुंसक बताया था और बहुत-सी अत्यन्त तीखी एवं रूखी बातें सुनायी थीं, उन सबको यहाँ याद करके तुम पापी कर्णको शीघ्र ही युद्धमें मार डालो ।। ३९-४० ।।
कस्मादुपेक्षां कुरुषे किरीटि- न्नुपेक्षितुं नायमिहाद्य कालः। यया धृत्या सर्वभूतान्यजैषी- र्ग्रासं ददत् खाण्डवे पावकाय ।। ४१ ।। तया धृत्या सूतपुत्रं जहि त्व- महं चैनं गदया पोथयिष्ये।
'किरीटधारी पार्थ! तुम क्यों इसकी उपेक्षा करते हो? आज यहाँ यह उपेक्षा करनेका समय नहीं है। तुमने जिस धैर्यसे खाण्डववनमें अग्निदेवको ग्रास समर्पित करते हुए समस्त प्राणियोंपर विजय पायी थी, उसी धैर्यके द्वारा सूतपुत्रको मार डालो। फिर मैं भी इसे अपनी गदासे कुचल डालूँगा' ।। ४१ १/२ ।।
अथाब्रवीद् वासुदेवोऽपि पार्थं दृष्ट्वा रधेषून् प्रतिहन्यमानान् ।। ४२ ।। अमीमृदत् सर्वपातेऽद्य कर्णो ह्यस्त्रैरस्त्रं किमिदं भो किरीटिन्। स वीर किं मुह्यसि नावधत्से नदन्त्येते कुरवः सम्प्रहृष्टाः ।। ४३ ।।
तदनन्तर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनके रथसम्बन्धी बाणोंको कर्णके द्वारा नष्ट होते देख उनसे इस प्रकार कहा 'किरीटधारी अर्जुन! यह क्या बात है? तुमने अबतक जितने बार प्रहार किये हैं, उन सबमें कर्णने तुम्हारे अस्त्रको अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट कर दिया है। वीर! आज तुमपर कैसा मोह छा रहा है? तुम सावधान क्यों नहीं होते? देखो, ये तुम्हारे शत्रु कौरव अत्यन्त हर्षमें भरकर सिंहनाद कर रहे हैं! ।। ४२-४३ ।।
कर्णं पुरस्कृत्य विदुर्हि सर्वे तवास्त्रमस्त्रैर्विनिपात्यमानम्। यया धृत्या निहतं तामसास्त्रं युगे युगे राक्षसाश्चापि घोराः ।। ४४ ।। दम्भोद्भवाश्चासुराश्चाहवेषु तया धृत्या जहि कर्णं त्वमद्य।
'कर्णको आगे करके सब लोग यही समझ रहे हैं कि तुम्हारा अस्त्र उसके अस्त्रोंद्वारा नष्ट होता जा रहा है। तुमने जिस धैर्यसे प्रत्येक युगमें घोर राक्षसोंका, उनके मायामय तामस अस्त्रका तथा दम्भोद्भव नामवाले असुरोंका युद्धस्थलोंमें विनाश किया है, उसी धैर्यसे आज तुम कर्णको भी मार डालो ।। ४४ १/२ ।।